ग़ज़ल: २
तवील जितना सफ़र ग़ज़ल का
कठिन है मंज़िल का पाना उतना.
ये कैसी ख़ुश्बू है सोच में जो
कि लफ्ज़ बनकर गुलाब महका.
कभी अंधेरों के साँप डसते
कभी उजाला न मन को भाता.
वो चुलबुलाहट, वो खिलखिलाहट
वो मेरा बचपन न फिर से लौटा.
कहीं तो मिलती नहीं है फ़ितरत
तो दिल से दिल भी कहीं है जुड़ता.
है दीप मंदिर का ये मेरा दिल
जो भक्ति के तेल से है जलता.
ये झूठ इतना हुआ है हावी
कि सच भी आकर गले में अटका.
गुमाँ हुआ ये क्षितिज पे देवी
ज़मीन पे यूँ आसमाँ है झुकता. ३०२



