गज़लः 8
ज़िंदगी से चन्द लम्हें मैं अब चुराकर लाई हूँ
मौत को ही मीत अपना अब बनाकर आई हूँ.
शिदतें देखी थी पहले पर कभी ऐसी न थी
याद से उनकी मगर रिश्ता निभाकर आई हूँ.
गर्दिशों की गर्द से होते नहीं हिम्मत शिकन
ख़ून से तलवों पे मेंहदी मैं सजाकर आई हूँ.
झूझना मुमकिन तो है इस जान लेवा दौर में
ख़ुदकुशी करने से ख़ुद को बस बचाकर आई हूँ.
सैकड़ों थे ज़िंदगी से यूँ हमें शिकवे-गिले
पर तेरे इसरार से सारे भुलाकर आई हूँ.
याद के जुगनू अंधेरों को मिटा देंगे मगर
राह में तेरी दिया मैं इक जलाकार आई हूँ.
जिस तराज़ू में था तोला, मुझपे वो भारी पड़ा
मोल उसका मैं मगर सारा चुकाकर आई हूँ.
श्राधा और विश्वास के वो भाव मैं लाऊं कहाँ से
सजदे में सर को मैं अपने बस झुकाकर आई हूँ.
गर्द है चहरे पे देवी यूँ उदासी की जमी
जीते जी अपना ही मातम ख़ुद मनाकर आई हूँ.१३६
गज़लः 7
वक़्त की गहराइयों से पा गए राज़े निहाँ
जीते जी मरने की कोशिश ने किया है बेज़ुबाँ.
वक्त के कुछ पल चुराकर जी रहे हैं हम यहाँ
सैर को निकले हैं घर से लौट कर जाना कहाँ.
सूनी सूनी राह लम्बी पर डगर आसाँ नहीं
खुद से मिलने के लिये ये तो बता जाऊँ कहाँ?
उम्र बढ़ती जा रही है, ज्यों घटे है ज़िंदगी
कितने मौसम आते जाते कर रहे है ये बयाँ.
वक्ते आखिर आ के ठहरे है फरिश्ते मौत के
जो चुराकर जिस्म से ले जायेंगे जाने कहाँ.
ख्वाब में क्या क्या इशारे कर रही थी रात कल
होश में बेहोश देवी है तुझे रहना यहाँ. १३२
गज़लः 6
तेरी रहमतों की ख़बर नहीं
मेरी बंदगी में असर नहीं.
सदा जिसकी नेकी निहां रहे
कहीं कोई ऐसा बशर नहीं.
जहां छांव सुख की मिले मुझे
वहां ऐसा कोई शजर नहीं.
वो तो ढूंढे बिन ही मिले थे ग़म
मिलीं खुशियां ढूंढे, मगर नहीं.
जिसे लोग कहते हैं जिंदगी
वो तो इतन आसां सफ़र नहीं.१३१
गज़लः 5
दिल ना माने कभी तो क्या कीजे
दिल करे दिल्लगी तो क्या कीजे.
सारे ग़म आस पास रहते थे
रश्क़ करती ख़ुशी तो क्या कीजे.
अपनी परछाई से वो खाइफ़ था
ना समझ हो कोई तो क्या कीजे.
इन्तहा दर्द की न रास आई
करले वो ख़ुदकुशी तो क्या कीजे.
ख़ाक ही वो जिया है दुनियां में
जिसने जी भर न पी तो क्या कीजे.
फूल करते निबाह खारों से
मुस्कराये कली तो क्या कीजे.
ख़ुश बयान किस कदर हूँ मैं देवी
ख़ुश हो किस्मत मेरी तो क्या कीजे.१२२
ग़ज़ल: 4
जान-पहचान के वे लोग कहाँ
हैं परायों में अपने लोग कहाँ.
मुस्करहट लबों पे जो देखें
आहे-दिल देखें ऐसे लोग कहाँ.
सिसकियों का ये सिलसिला तोड़ें
जो दिलासा दें आके लोग कहाँ.
घर जला है की दिल, धुआँ कैसा?
जाके देखें वहाँ, वे लोग कहाँ?
मेरी तनहाईयाँ जो सहलाएँ
धूप में साया बनके, लोग कहाँ?
घर में देते हैं वो पनाह, मगर
दिल का दर खोलें, वैसे लोग कहाँ?
उनपे झट से यक़ीन हम कर लें
हैं भरोसे के इतने लोग कहाँ?
हादिसों के शिकार सब देवी
उनसे बच निकलें, ऐसे लोग कहाँ? ३००
ग़ज़ल:3
घर से तन्हा जो आप निकलेंगे
हादसे अपने साथ ले लेंगे.
हौसलों को न मेरे ललकारो
आँधियों को भी पस्त कर देंगे.
हर तरफ़ हादसों का है जमघट
मौत के घाट कब वो उतरेंगे.
उनपे पत्थर जो फेंकें अपने ही
क्यों न शीशे यकीं के टूटेंगे.
होगा जब साफ आईना दिल का
लोग तब खुद को जान पायेंगे.
जो मुकम्मल हो आशियाँ दिल का
फिर तो हम दर-ब-दर ना भटकेंगे.
रेत पर घर बने है रिश्तों के
तेज़ झोंकों से वो तो बिखरेंगे.
तब कालेजा फटेगा आदम का
ख़ून इन्सानियत का देखेंगे.
है ख़यालों में खलबली देवी
इक नया गीत रोज़ लिखेंगे. ३०१