ग़ज़ल: 4
जान-पहचान के वे लोग कहाँ
हैं परायों में अपने लोग कहाँ.
मुस्करहट लबों पे जो देखें
आहे-दिल देखें ऐसे लोग कहाँ.
सिसकियों का ये सिलसिला तोड़ें
जो दिलासा दें आके लोग कहाँ.
घर जला है की दिल, धुआँ कैसा?
जाके देखें वहाँ, वे लोग कहाँ?
मेरी तनहाईयाँ जो सहलाएँ
धूप में साया बनके, लोग कहाँ?
घर में देते हैं वो पनाह, मगर
दिल का दर खोलें, वैसे लोग कहाँ?
उनपे झट से यक़ीन हम कर लें
हैं भरोसे के इतने लोग कहाँ?
हादिसों के शिकार सब देवी
उनसे बच निकलें, ऐसे लोग कहाँ? ३००



