दिल से दिल तक

October 3, 2007

दिल न मुझसे कभी ख़फा होता

Filed under: ग़ज़ल — Devi Nangrani @ 10:43 pm

गज़लः 14

दिल न मुझसे कभी ख़फा होता
उसका माना, अगर कहा होता.
यूँ न ख़ामोशियाँ सिसकतीं फिर
दर्द गर दर्द की दवा होता.
वो समझते ज़रूर दुख मेरा
दर्द ने गर उन्हें छुआ होता.
याद की शाख पर जो पंछी था
साथ मुझको भी ले उड़ा होता.
गर दवा कारगर न हो पाई
कुछ दुआ का असर हुआ होता.
दर बदर यूँ न घर से हम होते
मंज़िलों का अगर पता होता.
यूँ भटकती न राह में देवी
साथ उसका अगर रहा होता. २३६

जँग छोटी ये ज़िंदगी तो नहीं

Filed under: ग़ज़ल — Devi Nangrani @ 10:38 pm

ग़ज़ल: 13

जँग छोटी ये ज़िंदगी तो नहीं
सिर्फ़ जाना है मैं लड़ी तो नहीं.
उससे पहचान है पुरानी सी
दर्द अपना है अजनबी तो नहीं.
इल्म से दिल दिमाग़ रौशन है
इससे बेहतर भी रौशनी तो नहीं.
अजनबी को मैं कैसे अपनाऊँ
जान पहचान भी बनी तो नहीं.
हादसों की शिकायतें मत कर
हौसलों की डगर बुरी तो नहीं.
अपने ही शहर में है खोई क्यों
राह इतनी भी अजनबी तो नहीं.
पार कर तोड़ दे वो पुल देवी
इतना इंसान मतलबी तो नहीं.२८५

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