गज़लः १९
ज़हर सा है घुला हवाओं में
है घुटन सी भरी क़बाओं में.
खुश्क आँखें तो, सर्द हैं जज़बात
और बेरौनक़ी फ़िज़ाओं में.
हम तो जीते हैं रोज़ मर-मर कर
लुत्फ आता हमें सज़ाओं में.
अब तो जीना हुआ बहुत मुश्किल
रोज़ की आफतों -बलाओं में.
बद्दुआएं हो बेअसर ‘देवी’
पैदा कर वो असर दुआओं में.१२९
October 11, 2007
ज़हर सा है घुला हवाओं में
आमद आमद है फिर घटाओं की
गज़लः १८
आमद आमद है फिर घटाओं की
अब ज़रूरत है कुछ हवाओं की.
लोग निकले वे सुरख़ूरू होकर
सर पे जिनके दुआ है माओं की.
रात दिन शहर में भटकते हैं
खो गयी राह अब है गाओं की.
डर से पीले हुए सभी पत्ते
आहटें जब सुनी खिज़ाओं की.
बेगुनाही तो मेरी साबित है
फिर सज़ाएं है किन खताओं की.
कहके देवी मुझे पुकारा था
गूँज अब तक है उन सदाओं की.१२८
मुर्झाये याद के है सुमन
गज़लः१७
उजड़ा हुआ है मेरा चमन, या मिरे ख़ुदा.
मुर्झाये याद के है सुमन, या मिरे ख़ुदा.
जलता है आग में ये बदन, या मिरे खुदा
ओढ़े बिना ही अब तो कफन, या मिरे ख़ुदा.
कोई गया जहान से तो आ गया कोई
होता है यूं भी जनम-मरन, या मिरे ख़ुदा.
मैंने भी ले लिया है वो, जो कुछ मिला मुझे
देने के सारे सीखे चलन, या मिरे ख़ुदा.
अपने वतन से दूर मिरा रो रहा है दिल
अटका हुआ उसी में है मन, या मिरे ख़ुदा.
मिट्टी मिले जो देश की तो प्राण मैं तजूं
दिल में यही लगी है लगन, या मिरे ख़ुदा.
‘देवी’ है दरिया आग का दिल में मेरे रवां
बर्दाशत कर रही हूं जलन, या मिरे ख़ुदा.१२७



