दिल से दिल तक

October 12, 2007

एक तेरा नाम होता है

Filed under: ग़ज़ल — Devi Nangrani @ 5:26 pm

गज़लः 21
सभी के हाथ में साक़ी, छलकता जाम होता है
भरी महफ़िल के लब पर एक तेरा नाम होता है.
भले छोटा हो पर इन्सान माहिर हो हुनर में गर
उसीका ज़िक्र हर महफ़िल में अक्सर आम होता है.
ख़ुशी की चंदीनी भाती है सब को इस ज़माने में
मगर मेहनत कशों को श्रम में ही आराम होता है.
गुमाँ दौलत का होता है, किसी को नाज़ ग़ुरबत पर
किसी का नाम होता है, कोई बदनाम होता है.
अमीरी में बसी गहरी बुराई की है बुनियादें
गुनाहों का ग़रीबी पर ही हर इलज़ाम होता है.
निराशा मौत सी लगती है आशा ज़िंदगी देवी
अंधेरों में छुपा इक रोशनी का जाम होता है.१३७

मुहब्बत की ईंटें न होती अगरचे

Filed under: ग़ज़ल — Devi Nangrani @ 5:20 pm

गज़लः 20

किसी को किसी से शिकायत न होती
अगर ये ज़माने में ग़ुरबत न होती.
मुहब्बत की ईंटें न होती अगरचे
तो रिश्तों की पुख़्ती इमारत न होती.
कभी ख़ौफ़ को हम ना पहचानते, गर
अदालत के ऊपर अदालत न होती.
ये बदनामियाँ, ये शरारत, ये उलझन
खुदा काश हमको ये आदत न होती.
ज़माने में इतनी न होती तरक्की
जो इन्सानियत की इबादत न होती.
सितारे, न धरती, न आकाश होता
जो दुनियाँ पे उसकी इनायत न होती.
दरिंदों में इन्साँ बदल जाते देवी
उसूलों की गर यूँ हिफ़ाज़त ना होती. १३०

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