दिल से दिल तक

October 20, 2007

हम यक़ीनो- गुमां में रहते हैं

Filed under: ग़ज़ल — Devi Nangrani @ 5:26 pm

गजलः 25

 

झूठ के साथ सच ये कैसे हैं
हम यक़ीनो- गुमां में रहते हैं.

 

दिल में अहसास भी कुछ ऐसे हैं
मुझको अक्सर वो जिंदा रखते हैं.

 

ग़म की बुनियाद पर है गुलशन जो
उस चमन में भी फूल खिलते हैं.

 

उलझी उलझी सी हूं यहाँ मैं भी
उलझे उलझे वहां वो रहते हैं.

 

आईना राजदां रहा अपना
हम अकेले में बात करते हैं.

 

ठोकरों से बचाके दुनिया की
खुद को महफूज़ यूं भी रखते हैं.

 

सोचती हूं उन्हें भी तज दूं आज
वक्त बेवक्त़ जो उलझते हैं. १५५

है जो तौफ़ीक तो ज़रा देखो

Filed under: ग़ज़ल — Devi Nangrani @ 5:22 pm

गजलः 24

है जो तौफ़ीक तो ज़रा देखो
संग में भी ख़ुदा बसा देखो.
जिंदगी लड़खड़ा गई शायद
मौत का तहलका मचा देखो.
दिल के जज़बात मैं लिखूं कैसे
कम है लफ्ज़ों का सिलसिला देखो.
ख्वाहिशें रक्खो जिंदा तुम वर्ना
ज़िंदगी होगी बेमज़ा देखो.
छूटा शायद ग्रहण गुलामी का
उड़ती आज़ादियां ज़रा देखो.
दिल की दीवारो-दर पे दो दस्तक
शून्यता कह रही है क्या देखो.
सुबह के इंतज़ार में शायद
रात जागी है क्या ज़रा देखो.
अपना घूंघट उठाओ ऐ ‘देवी’
सामने कौन है खड़ा देखो? १५२

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