दिल से दिल तक

October 27, 2007

मौन भाषा को हमारी तर्ज़मानी दे गया

Filed under: ग़ज़ल — Devi Nangrani @ 3:36 pm

गज़लः 28

मौन भाषा को हमारी तर्ज़मानी दे गया
एक साकित सी कलम को फिर रवानी दे गया.

 

वलवले पैदा हुए हैं फिर मेरे अहसास में
जाते जाते मुस्कराकर इक निशानी दे गया.

 

दाव पर ईमान और बोली ज़मीरों पर लगी
सौदेबाज़ी के नगर में बेईमानी दे गया.

 

जाने क्या क्या बह गया था आँसुओं की बाढ़ में
ज़िंदगी भर डूबने को और पानी दे गया.

 

उसके आने से बढ़ी है रौनकें चारों तरफ़
जब गया तो फूल कलियों को जवानी दे गया.

 

दे गया जुंबिश मेरे सोए हुए अहसास को
मुझको देवी आज कोई कामरनी दे गया.१४५

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