प्रस्तुत है श्री आर. पी. शर्मा “महरिष” के ग़ज़ल संसार की दो चुनिंदा ग़ज़लें
प्रेषक : देवी नागरानी
ग़ज़ल – १
तर्जुमानी जहान की, की है
इस तरह हमने शायरी की है
अंधी गलियों में भटके जब जब हम
फ़िक्र-नौ ने निशांदेही की है
सबको बख़्शा है हौसला हमने
नाख़ुदाई, न रहबरी की है
ख़ुद ग़मों से निढाल होकर भी
हमने औरों की दिलदिही की है
जो हमें एक सूत्र में बांधें
उन प्रयासों की पैरवी की है
उससे सीखेंगे ख़ुशबयानी हम
इक परिंदे से दोस्ती की है
हमने पाई जहां झलक ‘महरिष’
आदमीयत की आरती की है
आर.पी. शर्मा ‘महरिष’
ग़ज़ल – २
सोचते ही ये अहले-सुख़न रह गये
गुनगुना कर वो भंवरे भी क्या कह गये
इस तरह भी इशारों में बातें हुई
लफ़्ज़ सारे धरे के धरे रह गये
नाख़ुदाई का दावा था जिनको बहुत
रौ में ख़ुदा अपने जज़्बात की बह गये
लब, कि ढूंढा किये क़ाफ़िये ही मगर
अश्क आये तो पूरी ग़ज़ल कह गये
‘महरिष’ उन कोकिलाओं के बौराए स्वर
अनकहे, अनछुए-से कथन कह गये
आर.पी. शर्मा ‘महरिष’
जिन्दगी को सर्द मोम सा पिघलते देखा ,
मैं मौन हूँ, तभी मैं खुश नही हूँ।
झूठी प्यास सी है जिन्दगी,
मिटाए नही मिटती ,
किताब-ऐ -जिन्दगी जीता हूँ “राज “,
फ़िर भी खुश नही हूँ।।
Comment by niyamak — June 7, 2008 @ 6:52 am
नाख़ुदाई का दावा था जिनको बहुत
रौ में ख़ुदा अपने जज़्बात की बह गये
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अपने जिस्म पर इतराते हैं लोग
जिसमें रहते हैं बहुत सारे रोग
जीवन की नाव वक्त की लहरों में
बहती जाती है
खुद को खैवनहार समझते हैं लोग
कभी डूबना है इस सच से सभी घबड़ाते हैं
इसलिये जीने के लिये
झूठे बहाने ढूंढे लिये जाते हैं
जिसमें सच के मायने गढ़े जाते हैं
पर वक्त पर अपने झूठ भी
साथ छोड़ जाते हैं
इस सच को जानते हुए भी
उससे मूंह छिपाते हैं लोग
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इस कविता पर मुझे यह शब्द कहने का दिल चाहा। कविता मुझे बहुत अच्छी लगी।
दीपक भारतदीप
Comment by दीपक भारतदीप — June 7, 2008 @ 11:56 am
क्या बात है, जिसके बात कोई बात नहीं, ये बात भी इक़ बात है. बहुत खूब. आगे भी पढ़ने की हसरत रहेगी. शुभकामनायें.
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उल्टा तीर
Comment by amit k. sagar — June 17, 2008 @ 2:56 pm
AAp sabhi ki abhari hoon, jin shabdarth ka arth main abhi tak samjhne ke pryaas mein, unhein sarlta se prakat karne ke liye .
Devi Nangrani
Comment by Devi Nangrani — November 27, 2008 @ 7:32 am