दिल से दिल तक

June 6, 2008

श्री आर. पी. “महरिष” के ग़ज़ल संसार की दो ग़ज़लें

Filed under: ग़ज़ल — Devi Nangrani @ 3:36 pm

प्रस्तुत है श्री आर. पी. शर्मा “महरिष” के ग़ज़ल संसार की दो चुनिंदा ग़ज़लें
प्रेषक : देवी नागरानी

ग़ज़ल – १

तर्जुमानी जहान की, की है
इस तरह हमने शायरी की है

अंधी गलियों में भटके जब जब हम
फ़िक्र-नौ ने निशांदेही की है

सबको बख़्शा है हौसला हमने
नाख़ुदाई, न रहबरी की है

ख़ुद ग़मों से निढाल होकर भी
हमने औरों की दिलदिही की है

जो हमें एक सूत्र में बांधें
उन प्रयासों की पैरवी की है

उससे सीखेंगे ख़ुशबयानी हम
इक परिंदे से दोस्ती की है

हमने पाई जहां झलक ‘महरिष’
आदमीयत की आरती की है

आर.पी. शर्मा ‘महरिष’

ग़ज़ल – २

सोचते ही ये अहले-सुख़न रह गये
गुनगुना कर वो भंवरे भी क्या कह गये

इस तरह भी इशारों में बातें हुई
लफ़्ज़ सारे धरे के धरे रह गये

नाख़ुदाई का दावा था जिनको बहुत
रौ में ख़ुदा अपने जज़्बात की बह गये

लब, कि ढूंढा किये क़ाफ़िये ही मगर
अश्क आये तो पूरी ग़ज़ल कह गये

‘महरिष’ उन कोकिलाओं के बौराए स्वर
अनकहे, अनछुए-से कथन कह गये

आर.पी. शर्मा ‘महरिष’

November 3, 2007

खामोशी में जो अश्क पले

Filed under: ग़ज़ल — Devi Nangrani @ 11:27 pm

गजलः 32

खामोशी में जो अश्क पले
क्या छुपते भला मुस्कान तले.
हर दिल में धुआं क्यूँ उठता है
क्यों अरमानों की होली जले?
दिल डूब गया सूरज के सँग
क्यों चांद न आया रात ढले.
बेनूर हुई दुनियाँ सारी
मस्तानों के ये बात खले.
पत्थर का दिल जब जब धड़के
ख़्वाबों को जैसे ख़्वाब छले.
रौशन रौशन है सब राहें
दीपों में किसका खून जले. १२०

October 30, 2007

खारों से उलझना भी बहुत मुश्किल

Filed under: ग़ज़ल — Devi Nangrani @ 1:41 am

ग़ज़लः 31
चमन में रहके खारों से उलझना भी बहुत मुश्किल
बिना उलझे गुलों की बू को पाना भी बहुत मुश्किल.

 

किसी के नाज़ नखरों को उठाना तो नहीं आसान
अगर आईना टूटा हो तो सजना भी बहुत मुश्किल.

 

किसे बर्बाद करके क्या कोई आबाद होता है
सुकूँ को दाव पर रखके है जीना भी बहुत मुश्किल.

 

गले में झूठ का पत्थर फँसा है इस तरह जिसको
उगलना भी बहुत मुश्किल, निगलना भी बहुत मुश्किल.

 

न छोड़ी चोर ने चोरी, न डसना साँप ने देवी
ये फ़ितरत है तो फ़ितरत को बदलना भी बहुत मुश्किल.१९४

आग ऐसी लगा गया कोई

Filed under: ग़ज़ल — Devi Nangrani @ 1:39 am

गज़लः 30
आग ऐसी लगा गया कोई
दामने-दिल जला गया कोई.

 

मेरी आँखों क पोंछ कर आँसू
अपना दामन भिगा गया कोई.

 

इक दफ़ा मेरे ख्वाब में आकर
सारी नीडें उड़ा गया कोई.

 

हौसला वर-शगुफ़्तगू करके
आस मेरी बंधा गया कोई.

 

ख़ैरियत मेरी पूछकर देवी
कर्ब़ दिल का बड़ा गया कोई.१७५

छू के दामन गई हवा मेरा

Filed under: ग़ज़ल — Devi Nangrani @ 1:37 am

गजलः 29

कसमासाता बदन रहा मेरा
छू के दामन गई हवा मेरा.
मुझको लूटा था बस खिज़ाओं ने
है गुले दिल हरा भरा मेरा.
तन्हा मैं हूँ और तन्हा राहें भी
साथ तन्हाइयों से रहा मेरा.
खोई हूं इस कदर जमाने में
पूछती सबसे हूँ पता मेरा.
आईना क्यों कुरूप इतना है
देख उसे अक्स डर रहा मेरा.
मैं अंधेरों से आ गई बाहर
जब से दिल और घर जला मेरा.
जिसने भी दी दुआ मुझे देवी,
काम आसान हो गया मेरा.१७२

October 27, 2007

मौन भाषा को हमारी तर्ज़मानी दे गया

Filed under: ग़ज़ल — Devi Nangrani @ 3:36 pm

गज़लः 28

मौन भाषा को हमारी तर्ज़मानी दे गया
एक साकित सी कलम को फिर रवानी दे गया.

 

वलवले पैदा हुए हैं फिर मेरे अहसास में
जाते जाते मुस्कराकर इक निशानी दे गया.

 

दाव पर ईमान और बोली ज़मीरों पर लगी
सौदेबाज़ी के नगर में बेईमानी दे गया.

 

जाने क्या क्या बह गया था आँसुओं की बाढ़ में
ज़िंदगी भर डूबने को और पानी दे गया.

 

उसके आने से बढ़ी है रौनकें चारों तरफ़
जब गया तो फूल कलियों को जवानी दे गया.

 

दे गया जुंबिश मेरे सोए हुए अहसास को
मुझको देवी आज कोई कामरनी दे गया.१४५

बिलोडा सोच का सागर

Filed under: ग़ज़ल — Devi Nangrani @ 3:33 pm

गज़लः 27
बिलोडा सोच का सागर लिखा तो ध्यान यह आया
समझ मेरी यहाँ कोई अभी तक ना समझ पाया.

 

पनाह पाई है जीवन ने, रिहा है मौत का साया
न पूछी आख़री खवाइश ग़ज़ब का ज़ुल्म है ढाया.

 

सुनामी ने सजाई मौत की महफ़िल फ़िज़ाओं में
शिकारी मौत बन कर चुपके-चुपके से कफ़न लाया.

 

सदा से हो रहा है फिर, रहेगा ये चलन कल भी
न जिसका ज़ोर चलता है उसी पर है ग़ज़ब ढाया.

 

हँसे थे खिलखिलाकर ज़ख़्म भी महफ़िल में जब लोगो
तभी कुछ और टूटा था लगा वो रूह का साया.

 

इमारत जो बनी भय की, वो किस बुनियाद पर देवी
खलल बन मौत का ख़तरा रहा जीवन का सरमाया.१४४

पामाल हो गये सब अरमान

Filed under: ग़ज़ल — Devi Nangrani @ 3:28 pm

गज़लः 26

पामाल हो गये सब अरमान कुछ किए बिन
खमयाज़ा हमने भुगता कुछ बोले कुछ कहे बिन.

 

मुश्ताख़ चाँदीनी की मैं कल थी आज भी हूँ
पर चाँद जाने क्योंकार वापस गया मिले बिन.

 

कुछ तो मलाल दिल में इस बात का रहा है
बादे-सबा भी लौटी बू-ए वफ़ा दिए बिन.

 

इतने रकीब मेरे, इक तो रफ़ीक़ होता
जो लौट कर न जाता, मुझसे गले मिले बिन.

 

इक पल न दिल मीरा ये, महरूम याद से था
मुश्किल था साँस लेना, यूँ आह भी भरे बिन.

 

बचना मुहाल देवी फुरक़त की आग से है
मुमकिन नहीं सलामत, अरमान रहे जले बिन.१३८

October 20, 2007

हम यक़ीनो- गुमां में रहते हैं

Filed under: ग़ज़ल — Devi Nangrani @ 5:26 pm

गजलः 25

 

झूठ के साथ सच ये कैसे हैं
हम यक़ीनो- गुमां में रहते हैं.

 

दिल में अहसास भी कुछ ऐसे हैं
मुझको अक्सर वो जिंदा रखते हैं.

 

ग़म की बुनियाद पर है गुलशन जो
उस चमन में भी फूल खिलते हैं.

 

उलझी उलझी सी हूं यहाँ मैं भी
उलझे उलझे वहां वो रहते हैं.

 

आईना राजदां रहा अपना
हम अकेले में बात करते हैं.

 

ठोकरों से बचाके दुनिया की
खुद को महफूज़ यूं भी रखते हैं.

 

सोचती हूं उन्हें भी तज दूं आज
वक्त बेवक्त़ जो उलझते हैं. १५५

है जो तौफ़ीक तो ज़रा देखो

Filed under: ग़ज़ल — Devi Nangrani @ 5:22 pm

गजलः 24

है जो तौफ़ीक तो ज़रा देखो
संग में भी ख़ुदा बसा देखो.
जिंदगी लड़खड़ा गई शायद
मौत का तहलका मचा देखो.
दिल के जज़बात मैं लिखूं कैसे
कम है लफ्ज़ों का सिलसिला देखो.
ख्वाहिशें रक्खो जिंदा तुम वर्ना
ज़िंदगी होगी बेमज़ा देखो.
छूटा शायद ग्रहण गुलामी का
उड़ती आज़ादियां ज़रा देखो.
दिल की दीवारो-दर पे दो दस्तक
शून्यता कह रही है क्या देखो.
सुबह के इंतज़ार में शायद
रात जागी है क्या ज़रा देखो.
अपना घूंघट उठाओ ऐ ‘देवी’
सामने कौन है खड़ा देखो? १५२

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