गज़लः 23
निकल कर आंख से आंसू कभी बहने नहीं पाए
हमारे दर्द अपनी दास्तां कहने नहीं पाए.
अदावत थी उन्हें मुझसे, मुझे भी रंजिशें कुछ थीं
कई दुशवारियां थीं लब जिन्हें कहने नहीं पाए.
वो पत्थर की जो मूरत थी, उसे सबने ख़ुदा माना
मगर जिंदा दिलों की धड़कने सुनने नहीं पाए.
न जाने किस सितमगर के मेरी आंखों पे पहरे हैं
जो उसको देखना चाहूं, नज़र उठने नहीं पाए.
कभी ठहरे हुए पानी में कंकर तो कई फेंके
कहीं पर दायरे उस झील में बनने नहीं पाए.
बड़ी ज़ालिम है ये दुनिया बताओ क्या करें ‘देवी’
यहां दो पल कभी हम चैन से रहने नहीं पाए.१४२
गज़लः 22
बस्तियाँ ख़ुद परेशाँ हैं रहती वहाँ
आदमी आदमी से ख़फा है जहाँ.
कोई तारुफ़ करा दे मेरा मौत से
ज़िंदगी से अभी तक मिली हूँ कहाँ.
देर से ही सही दिल समझ तो गया
वक़्त की अहमियत हो रही है जवाँ.
भीड़ रिश्तों की चारों तरफ़ आज भी
ख़ाली जाने क्यों रहता है दिल का मकाँ.
जो खुले आम ख़तरों से है खेलते
क्यों छुपा आशना वो हुए है निहाँ.
दिल की दुनियाँ में जब जब मैं डूबी रही
कहकशाँ में नज़र आ गया कहकशाँ.१४१
गज़लः 21
सभी के हाथ में साक़ी, छलकता जाम होता है
भरी महफ़िल के लब पर एक तेरा नाम होता है.
भले छोटा हो पर इन्सान माहिर हो हुनर में गर
उसीका ज़िक्र हर महफ़िल में अक्सर आम होता है.
ख़ुशी की चंदीनी भाती है सब को इस ज़माने में
मगर मेहनत कशों को श्रम में ही आराम होता है.
गुमाँ दौलत का होता है, किसी को नाज़ ग़ुरबत पर
किसी का नाम होता है, कोई बदनाम होता है.
अमीरी में बसी गहरी बुराई की है बुनियादें
गुनाहों का ग़रीबी पर ही हर इलज़ाम होता है.
निराशा मौत सी लगती है आशा ज़िंदगी देवी
अंधेरों में छुपा इक रोशनी का जाम होता है.१३७
गज़लः 20
किसी को किसी से शिकायत न होती
अगर ये ज़माने में ग़ुरबत न होती.
मुहब्बत की ईंटें न होती अगरचे
तो रिश्तों की पुख़्ती इमारत न होती.
कभी ख़ौफ़ को हम ना पहचानते, गर
अदालत के ऊपर अदालत न होती.
ये बदनामियाँ, ये शरारत, ये उलझन
खुदा काश हमको ये आदत न होती.
ज़माने में इतनी न होती तरक्की
जो इन्सानियत की इबादत न होती.
सितारे, न धरती, न आकाश होता
जो दुनियाँ पे उसकी इनायत न होती.
दरिंदों में इन्साँ बदल जाते देवी
उसूलों की गर यूँ हिफ़ाज़त ना होती. १३०
गज़लः १९
ज़हर सा है घुला हवाओं में
है घुटन सी भरी क़बाओं में.
खुश्क आँखें तो, सर्द हैं जज़बात
और बेरौनक़ी फ़िज़ाओं में.
हम तो जीते हैं रोज़ मर-मर कर
लुत्फ आता हमें सज़ाओं में.
अब तो जीना हुआ बहुत मुश्किल
रोज़ की आफतों -बलाओं में.
बद्दुआएं हो बेअसर ‘देवी’
पैदा कर वो असर दुआओं में.१२९
गज़लः १८
आमद आमद है फिर घटाओं की
अब ज़रूरत है कुछ हवाओं की.
लोग निकले वे सुरख़ूरू होकर
सर पे जिनके दुआ है माओं की.
रात दिन शहर में भटकते हैं
खो गयी राह अब है गाओं की.
डर से पीले हुए सभी पत्ते
आहटें जब सुनी खिज़ाओं की.
बेगुनाही तो मेरी साबित है
फिर सज़ाएं है किन खताओं की.
कहके देवी मुझे पुकारा था
गूँज अब तक है उन सदाओं की.१२८
गज़लः१७
उजड़ा हुआ है मेरा चमन, या मिरे ख़ुदा.
मुर्झाये याद के है सुमन, या मिरे ख़ुदा.
जलता है आग में ये बदन, या मिरे खुदा
ओढ़े बिना ही अब तो कफन, या मिरे ख़ुदा.
कोई गया जहान से तो आ गया कोई
होता है यूं भी जनम-मरन, या मिरे ख़ुदा.
मैंने भी ले लिया है वो, जो कुछ मिला मुझे
देने के सारे सीखे चलन, या मिरे ख़ुदा.
अपने वतन से दूर मिरा रो रहा है दिल
अटका हुआ उसी में है मन, या मिरे ख़ुदा.
मिट्टी मिले जो देश की तो प्राण मैं तजूं
दिल में यही लगी है लगन, या मिरे ख़ुदा.
‘देवी’ है दरिया आग का दिल में मेरे रवां
बर्दाशत कर रही हूं जलन, या मिरे ख़ुदा.१२७
गज़लः १६
खुदा तू है कहाँ ये ज़िक्र ही सब की ज़ुबाँ पर था
ज़मीं पर तू कहाँ मिलता हमें तू आसमाँ पर था.
वफ़ा मेरी नज़र अंदाज़ कर दी उन दिवानों ने
मेरी ही नेकियों का ज़िक्र कल जिनकी ज़ुबाँ पर था.
भरोसा दोस्त से बढ़कर किया था मैंने दुशमन पर
मेरा ईमान हर लम्हाँ मकामें इम्तिहाँ पर था.
बड़ी ज़ालिम वो हस्ती है कि जिसने नोच ली अस्मत
मगर इल्ज़ाम बदकारी का आख़िर बेज़ुबाँ पर था.
ये आँसू, आहें, पीड़ा दर्द सारी दिल की फ़सलें हैं
मुहब्बत का ज़माना बोझ इक कलवे-जवाँ पर था.
गुज़ारी ज़िंदगी बेहोश होकर मैंने दुनियाँ में
मेरा विश्वास सदियों से न जाने किस गुमाँ पर था.
बहुत से आशियाने थे गुलिस्तां में मगर देवी
सितम बर्के तपाँ का सिर्फ़ मेरे आशियाँ पर था.१२६
गज़लः१५
ये है पहचान एक औरत की
माँ बाहन, बीवी, बेटी या देवी.
अपने आँचल की छाँव में सबको
दे रही है पनाह औरत ही.
दरिया अश्कों का पार करती वो
ज़िंदगी की भंवर में जो रहती.
दुनियाँ वाले बदल गये, लेकिन
एक मैं ही हूँ जो नहीं बदली.
जितनी ऊँची इमारतें हैं ये
मैं तो लगती हूँ उतनी ही छोटी.
बेनकाबों की भीड़ में खोकर
ख़ुद वो पर्दा नशीं नहीं होती. १२५
गज़लः 14
दिल न मुझसे कभी ख़फा होता
उसका माना, अगर कहा होता.
यूँ न ख़ामोशियाँ सिसकतीं फिर
दर्द गर दर्द की दवा होता.
वो समझते ज़रूर दुख मेरा
दर्द ने गर उन्हें छुआ होता.
याद की शाख पर जो पंछी था
साथ मुझको भी ले उड़ा होता.
गर दवा कारगर न हो पाई
कुछ दुआ का असर हुआ होता.
दर बदर यूँ न घर से हम होते
मंज़िलों का अगर पता होता.
यूँ भटकती न राह में देवी
साथ उसका अगर रहा होता. २३६