दिल से दिल तक

सितम्बर 30, 2007

ज़िंदगी से चन्द लम्हें

Filed under: ग़ज़ल-दिल से दिल तक — Devi Nangrani @ 4:10 अपराह्न

गज़लः 8

ज़िंदगी से चन्द लम्हें मैं अब चुराकर लाई हूँ
मौत को ही मीत अपना अब बनाकर आई हूँ.
शिदतें देखी थी पहले पर कभी ऐसी न थी
याद से उनकी मगर रिश्ता निभाकर आई हूँ.
गर्दिशों की गर्द से होते नहीं हिम्मत शिकन
ख़ून से तलवों पे मेंहदी मैं सजाकर आई हूँ.
झूझना मुमकिन तो है इस जान लेवा दौर में
ख़ुदकुशी करने से ख़ुद को बस बचाकर आई हूँ.
सैकड़ों थे ज़िंदगी से यूँ हमें शिकवे-गिले
पर तेरे इसरार से सारे भुलाकर आई हूँ.
याद के जुगनू अंधेरों को मिटा देंगे मगर
राह में तेरी दिया मैं इक जलाकार आई हूँ.
जिस तराज़ू में था तोला, मुझपे वो भारी पड़ा
मोल उसका मैं मगर सारा चुकाकर आई हूँ.
श्राधा और विश्वास के वो भाव मैं लाऊं कहाँ से
सजदे में सर को मैं अपने बस झुकाकर आई हूँ.
गर्द है चहरे पे देवी यूँ उदासी की जमी
जीते जी अपना ही मातम ख़ुद मनाकर आई हूँ.१३६

वक़्त की गहराइयों से

Filed under: ग़ज़ल-दिल से दिल तक — Devi Nangrani @ 3:54 अपराह्न

गज़लः 7

वक़्त की गहराइयों से पा गए राज़े निहाँ
जीते जी मरने की कोशिश ने किया है बेज़ुबाँ.

वक्त के कुछ पल चुराकर जी रहे हैं हम यहाँ
सैर को निकले हैं घर से लौट कर जाना कहाँ.

सूनी सूनी राह लम्बी पर डगर आसाँ नहीं
खुद से मिलने के लिये ये तो बता जाऊँ कहाँ?

उम्र बढ़ती जा रही है, ज्यों घटे है ज़िंदगी
कितने मौसम आते जाते कर रहे है ये बयाँ.

वक्ते आखिर आ के ठहरे है फरिश्ते मौत के
जो चुराकर जिस्म से ले जायेंगे जाने कहाँ.

ख्वाब में क्या क्या इशारे कर रही थी रात कल
होश में बेहोश देवी है तुझे रहना यहाँ. १३२

तेरी रहमतों की ख़बर नहीं

Filed under: ग़ज़ल-दिल से दिल तक — Devi Nangrani @ 3:52 अपराह्न

गज़लः 6

तेरी रहमतों की ख़बर नहीं
मेरी बंदगी में असर नहीं.
सदा जिसकी नेकी निहां रहे
कहीं कोई ऐसा बशर नहीं.
जहां छांव सुख की मिले मुझे
वहां ऐसा कोई शजर नहीं.
वो तो ढूंढे बिन ही मिले थे ग़म
मिलीं खुशियां ढूंढे, मगर नहीं.
जिसे लोग कहते हैं जिंदगी
वो तो इतन आसां सफ़र नहीं.१३१

रश्क़ करती ख़ुशी तो क्या कीज

Filed under: ग़ज़ल-दिल से दिल तक — Devi Nangrani @ 2:21 पूर्वाह्न

गज़लः 5
दिल ना माने कभी तो क्या कीजे
दिल करे दिल्लगी तो क्या कीजे.
सारे ग़म आस पास रहते थे
रश्क़ करती ख़ुशी तो क्या कीजे.
अपनी परछाई से वो खाइफ़ था
ना समझ हो कोई तो क्या कीजे.
इन्तहा दर्द की न रास आई
करले वो ख़ुदकुशी तो क्या कीजे.
ख़ाक ही वो जिया है दुनियां में
जिसने जी भर न पी तो क्या कीजे.
फूल करते निबाह खारों से
मुस्कराये कली तो क्या कीजे.
ख़ुश बयान किस कदर हूँ मैं देवी
ख़ुश हो किस्मत मेरी तो क्या कीजे.१२२

जान-पहचान के वे लोग कहाँ

Filed under: ग़ज़ल-दिल से दिल तक — Devi Nangrani @ 2:18 पूर्वाह्न

 

ग़ज़ल: 4

जान-पहचान के वे लोग कहाँ
हैं परायों में अपने लोग कहाँ.
मुस्करहट लबों पे जो देखें
आहे-दिल देखें ऐसे लोग कहाँ.
सिसकियों का ये सिलसिला तोड़ें
जो दिलासा दें आके लोग कहाँ.
घर जला है की दिल, धुआँ कैसा?
जाके देखें वहाँ, वे लोग कहाँ?
मेरी तनहाईयाँ जो सहलाएँ
धूप में साया बनके, लोग कहाँ?
घर में देते हैं वो पनाह, मगर
दिल का दर खोलें, वैसे लोग कहाँ?
उनपे झट से यक़ीन हम कर लें
हैं भरोसे के इतने लोग कहाँ?
हादिसों के शिकार सब देवी
उनसे बच निकलें, ऐसे लोग कहाँ? ३००

हौसलों को न मेरे ललकरो

Filed under: ग़ज़ल-दिल से दिल तक — Devi Nangrani @ 2:14 पूर्वाह्न

ग़ज़ल:3

 

घर से तन्हा जो आप निकलेंगे
हादसे अपने साथ ले लेंगे.
हौसलों को न मेरे ललकारो
आँधियों को भी पस्त कर देंगे.
हर तरफ़ हादसों का है जमघट
मौत के घाट कब वो उतरेंगे.
उनपे पत्थर जो फेंकें अपने ही
क्यों न शीशे यकीं के टूटेंगे.
होगा जब साफ आईना दिल का
लोग तब खुद को जान पायेंगे.
जो मुकम्मल हो आशियाँ दिल का
फिर तो हम दर-ब-दर ना भटकेंगे.
रेत पर घर बने है रिश्तों के
तेज़ झोंकों से वो तो बिखरेंगे.
तब कालेजा फटेगा आदम का
ख़ून इन्सानियत का देखेंगे.
है ख़यालों में खलबली देवी
इक नया गीत रोज़ लिखेंगे. ३०१

सितम्बर 28, 2007

“आओ हिंदी सीखें”

Filed under: समीक्षा — Devi Nangrani @ 11:41 अपराह्न

संपादकः श्रीमती सारिता मेहता

ब फिज़ाओं में महक रही है हिंदी भाषा

विश्व का मँच मिला हिंदी का
घर घर में अब हिंदी बोलो।
रात की रानी जैसे महकी
हिंदी भाषा फिज़ा में घोलो।। देवी नागरानी

बाल साहित्य के “आओ हिंदी सीखें”

गत में “आओ हिंदी सीखें”जी का पहला पर पुख़्तगी से रखा गया कदम है। नाम से, अर्थ और उदेश्य दोनों स्पष्ट नज़र आ रहे हैं। भाषा एक अदभुत रचना है, जो मनुष्य द्वारा रची भी जाती है और उसे रचती भी है। “हिंदी भाषा नहीं है, एक प्रतीक है, भारत की पहचान है, हिंदी को बढ़ावा मिल रहा है, यह हिंदुस्तानियों की मेहनत है। अनेक भाषाओं के आदान प्रदान से हमारी संस्कृति पहचानी जाती है। किसी भी भाषा का साहित्य उस भाषा का वैभव है, उस भाषा का सौंदर्य है। हर देश की तरक्की उसकी भाषा की तरक्की से जुड़ी होती है। हिंदी केवल भाषा नहीं, एक सौंदर्य है, बहती गंगा है, मधुर वाणी है।

मानव मन की वाणी हिंदी
आदि वेद की वाणी हिंदी।

सामान्य साहित्य हो या बाल साहित्य हो, दोंनों का उदेश्य और प्रयोजन समान है। बच्चों का एक स्वतंत्र व्यक्तित्व होता है, उनकी रुचि और मनोवृति को ध्यान में रखकर लिखा गया साहित्य ही बाल साहित्य कह जा सकता है। एक ऐसा साहित्य जो उन में बोये हुए अंकुरों को पुष्ट करता है और उन्हें अपनी छोटी समझ बूझ के आधार पर जीवन पथ पर आती जाती हर क्रिया को पहचानने में मदद करता है, साथ साथ उन्हें यह भी ज्ञान हासिल होता है कि वे अपनी संस्कृति को अपने अन्दर विकसित कर पायें।
बाल साहित्य के शिरोमणि श्री बालशौर रेड्डी ने माल ज्ञान विज्ञान पर बातों के दौरान अपनी प्रतिक्रिया में संक्षेप में बताते हुए कहा “बाल साहित्य के सूत्रों से आपका कहने सुनने का नाता है, था और चलता रहेगा। टिमटिमाते सितारे, पानी में मछली, जिज्ञासा भरे प्रश्न उत्पन करती है, प्रश्न उत्तर की चाहत रखता है, बस बाल मन समझने की जरूरत है, चिंतन मनन के पश्चात उसको पाचन करने का समय देना हमारा कर्तव्य है।
हिंदी बाल साहित्य के लेखक का यह कर्तव्य बनता है कि बाल साहित्य के माध्यम से बच्चों की सोच को सकारात्मक रूप देने का प्रयास भी करें। साहित्य को रुचिकर बनायें, विविध क्षेत्रों की जानकारी अत्यंत सरल तथा सहज भाषा में उनके लिये प्रस्तुत करें जिससे बालक की चाह बनी रहे और उनमें जिज्ञासा भी उत्पन होती रहे। इससे उनमें संवेदनशीलता और मानवीय संबंधों में मधुरता बढ़ेगी।
जुलाई में न्यूयार्क में ८वें विश्व हिंदी सम्मेलन के दौरान बाल साहित्य पर काफ़ी विस्तार से चर्चा हुई और बहुत ही अच्छे मुद्दे सामने आए जिनका उल्लेख यहाँ करना ज़रूरी है। डॉ. सुशीला गुप्ता ने बच्चों के मनोविज्ञान की ओर इशारा करते हुए कहा कि बच्चों का मन मस्तिष्क साफ स्वच्छ दिवार होता है जिस पर कुछ भी बड़ी सरलता से उकेरा जा सकता है। इसलिये बच्चों में बचपन से ये शब्द बीज बो देने चाहिये। इसी सिलसिले में दिल्ली के इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविध्यालय की डॉ. स्मिता चतुर्वेदी ने बाल साहित्य के स्वरूप और दिशाओं पर रौशनी डालते हुए यही कहा – “साहित्य बालकों की अपनी विशिष्ट छोटी छोटी समस्याओं को उभारे, उन्हें गुदगुगदाएँ, उनका मनोरंजन करें, और उनकी समस्याओं का आदर्श से हट कर समाधान दे, वही साहित्य श्रेष्ठ बाल साहित्य है।”

भाषा शिक्षण के अपने अनुभवों से परिचित कराते हुए सुश्री सुषम बेदी कहती है, “भाषा पढ़ाना एक कला है और विज्ञान भी। कला इसलिये कि उसमें लगातार सृजनात्मकता की जरूरत है और विज्ञान इसलिये कि उसमें व्यवस्था और नियमों का पूरा पूरा ध्यान रखना पड़ता है। ऊर्जा, उत्साह, सृजनात्मकता और उपज जहाँ भाषा शिक्षण को एक कला का रूप प्रदान करते हैं, वहीं पाठक-पद्धतियों का सही इस्तेमाल विज्ञान का। दोनों का संतुलन ही श्रेष्ठ भाषा शिक्षण की नींव है।”
बच्चे का मानसी विकास ही कुछ ऐसा है, वह आज़ादी का कायल रहता है, बंधन मुक्त। अगर कोई उनसे कहे कि यह आग है, जला देती है, तो उसका मन विद्रोही होकर उस तपिश को जानने, पहचानने की कोशिश में खुद को कभी कभी हानि भी पहुँचा बैठता है। सवालों का ताँता रहता है- क्यों हुआ? कैसे हुआ? और अपनी बुद्धि अनुसार काल्पनिक आकृतियाँ खींचता है और अपनी सोच से भी अनेक जाल बुनता रहता है। मसले का हल अपनी नज़र से आप खोजता है यही उसका ज्ञान है और यही उसका मनोविज्ञान भी। उनके मानसिक व बौद्धिक विकास को ध्यान में रखकर रचा गया साहित्य उनके आने वाले विकसित भविष्य को नज़र में रख कर लिखा जाये तो वह इस पीढ़ी की उस पीढ़ी को दी गई एक अनमोल देन होगी या विरासत कह लें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं।

सरिता जी की मुकम्मिल कोशिश के रूप में उनका पहला कदम “आओ हिंदी सीखें” हमारे सामने इन सभी समस्याओं का समाधान बनकर आया है। प्रवासी भारतीय बच्चे में हिंदी के इस बाल साहित्य के माध्यम से भारतीय इतिहास, संस्कृति, साहित्य से जुड़े रहेंगे। साहित्य सामग्री रुचिकर हो तो बाल मन सहज ही उसकी ओर आकर्षित होता है, जैसे रंग बिरंगी तस्वीरें के आधार से शब्दार्थ को सरलता से समझ पाने कि क्षमता बढ़ जाती है, जिसका प्रयास भी इस पुस्तक में खूब दिखाई देता है। यह पुस्तक बहु-भाषी, बहु-संस्कारी, नये सीखने वाले देश और विदेश के बच्चों को देवनागरी और रोमन दोनों ही लिपियों में पढ़ने और समझने में मददगार सिद्ध होगी। इसमें सरल कविता द्वारा स्वर व व्यंजन को मिसाल साहित पेश किया है जिसे शुरूआती सीखने वाले शागिर्द बड़ी आसानी से याद कर सकते हैं। यहाँ सरिताजी ने बच्चों की मानसिकता को परख कर उसे रोचक ढंग से नवनीतम रूप में प्रस्तुत करने का सफल प्रयास किया है, जिससे उनकी निष्ठा, रचनात्मकता और रोचक बनाकर प्रस्तुत किया है जिसके लिये मैं उन्हें मुबारकबाद देती हूँ।

बस आवश्यकता है उस पुल की जो बाल साहित्य को बच्चों तक पहुँचा पाए। पाठ्य सामग्री हो तो फिर ज़रूरत रहती है वह अमानत बालकों तक पहुँचाने तक की, जो उत्तरदायित्व का काम है। बाल जन्म दिवस पर, शिक्षक दिवस हो या कोई तीज त्यौहार या राष्ट्र दिवस हो, बच्चों को खिलौने, मिठाई या कपड़े लेकर देने से बेहतर है उन्हें बाल साहित्य ही भेंट में दिया जाय, जिससे उन में चाह के अँकुर खिलने लगेंगे और वे अधीरता से हर बार साहित्य की उपेक्षा की बजाय स्वागत करेंगे, अपेक्षा रखेंगें। पर उस मुकाम को हासिल करने का जो भाषा का यज्ञ है उसकी बड़ी ज़िम्मेदारी हम पर, आप पर, और इस पीढ़ी के नौजवान कंधों पर भी है। सवाल यह फिर भी मन में उठता है कि विरासत में हम अपने बच्चों को वह भाषा “हिंदी”, जिसके लिये हम तकरीरें करते हैं, दलीलें देते है, इकट्ठे होकर भीड़ का हिस्सा बनते हैं, वो अमानत उन्हें दे पाते है या नहीं। अगर हमारी युवा पीढ़ी और आने वाली पीढ़ियाँ इसे अपनाने में, संपर्क की भाषा बनाने में नाकामयाब होती है तो दोष हमारा है, देश की भाषा देश में मज़बूत रहेगी तो तब जाकर वह विदेश में पनप पायेगी, और तब ही मातृभाषा से राष्ट्र भाषा बनेगी। देश की भाषा विदेश तक पहुँचे, यह हमारी परीक्षा है, कहाँ तक हम निभा पाते हैं, कितना सींच पाते है इसे अपना व्यहवार से, दुलार से ताकि इसकी जड़ों में पुख्तगी आ सके, और यह लोरी बनकर देश, प्रवासी देश के घर घर में जहाँ एक हिंदुस्तानी का दिल धड़कता है, वहाँ गूँज बन कर फिज़ाओं में फैलती रहे, जिसका विस्तार आकाश की बुलंदियों से ऊँचा हो। जय हिंद। जय हिंदी !!!

Adapted by Devi Nangrani

http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/D/DeviNangrani/ab_fizaaon_mein_mahak_Sameeksha.htm

सितम्बर 27, 2007

“वसीयत” के रचनाकार

Filed under: समीक्षा — Devi Nangrani @ 10:41 अपराह्न

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“वसीयत” के रचनाकार का छोटा सा परिचय

श्री महावीर शर्मा लंडन के निवासी, एक सुलझे हुए कहानीकार और गज़ल गो शायर भी है. परदेस हो या देश एक हिंदुस्तानी ह्रदय हर द्रष्टिकोण से अपने देश की सभ्यता और वहाँ की संस्क्रुति अपने आस पास के पात्रों में ढूँढता रहता है. शायद कहीं न कहीं उसे अपना वजूद बिखरता नज़र आता है जिसका सिमटाव करने की कोशिश यह कहानी एक आईना बनकर सामने पेश आई है. साहित्य की सैर को निकलें तो उनकी साईट पर ज़रूर अपना पड़ाव बनाएं.

कहानीः “वसीयत”

महावीर शर्मा द्वारा लिखी गई यह कहानी दिलों का हक़ीकी दस्तावेज़ है. एक चलते फिरते टाइमज़ोन में ज़िंदगी के माइनों के बदलते रंग का ज़ाइका हक़ीकत का जामा पहन कर सामने आया है.

“चलती चक्की देककर दिया कबीरा रोइ
दो पाटन के बीच में साबित बचा न कोइ.”

ज़िंदगी और मौत का फासला दर गुज़र करते करते, रिश्तों की बाज़ार से गुज़रना पड़ता है. यह एक आम इन्सान की ज़िंदगी का हिस्सा है जो एक कड़वे अहसास का ज़हरीला घूँट पीने के बाद ही तजुरबा बन जाता है. आजकल ये एक आम चलन हो रहा है, शायद मशिनों के दौर में रहते रहते इन्सान की सोच भी मशीनी पुरज़ों की तरह चलती रहती है, अपना काम करती रहती है , बिना यह जाने, बिना यह देखे कि उन पाटों के बीच कौन आया, कौन ज़ख्मी हुआ, कौन कराह उठा. इस शोर के दौर में चीख़ का कानों तक पहुंच पाना तो नामुमकिन है, जहाँ बहरों की बस्तियाँ गूँगों की भाषा अब भी समझने के प्रयास में लगी हुई हैं. देखा और समझा जाए तो यह बात आईना बन कर सामने आती है कि कोई भी बुज़ुर्ग पैदा नहीं होता. ‘आज का बालक कल का पिता’ यही चलन है और रहेगा भी. बस सोच की रफ़्तार ताल मेल नहीं रख पाती और वही टाइमज़ोन का जेनिरेशन गैप बन जाता है.

खा़मुशी को ही झेलिये साहब
मुँह से कुछ भी न बोलिये साहब. देवी

गुफ़्तगू की तरह ख़ामोशियाँ भी बोलती हैं, चीख़ती है पर बेसदा सी उनकी वो आवाज़ें घुटन बन कर दफ़्न हो जाती हैं उन दिलों की धड़कनों में, जहाँ साँसें अहसास बनकर धड़कती हैं. ख़ामुशी की घुटन का घेराव जहाँ घना हो जाता है, वहाँ उसे तोड़ कर एक ज़िंदा लाश को जीवन दान देना एक नेक कदम होता है. पल दो पल उस बुढ़ापे को सहारा देना, उसके पास बैठकर उस के मन की भावनाओं को टटोलना, या उन्हें कुरेदने की बजाय सहलाना किसी तीर्थ पर जाने से ज़्यादा माइने रखता है क्योंकि “पत्थरों में ख़ुदा बसा है” कहना और उस सत्य का दर्शन करना अलग अलग दिशाओं का प्रतीक है, धड़कते दिल में रब बसता है यह एक जाना माना सच है. पर सच से आँखें चुराना, कतराकर पास से होकर गुज़र जाना कितना आसान हो गया है. हाँ जब सच का सामना होता है तो ज़्यादा कुछ नहीं बदलता, इतिहास गवाह है हर बात दोहराई जाती है, सिर्फ नाम बदलते हैं, रिश्तों के माइने बदलते हैं, हालात वही के वही रहते हैं. शब्दों से टपकती हुई पीडा़ का अहसास देखें उनके ह्रदय की गहराइयों को टटोलें, पात्रों की विवशता, एकाकीपन के सूत्र में बंधती जा रही है.

‘एक रात जब मूसलाधार वर्षा हो रही थी। ऐथल के ऐसा तेज़ दर्द हुआ जो उस के लिए सहना कठिन था। मैंने एम्बुलैंस मंगाई और ऐथल की करहाटों व अपनी घबराहट के साथ अस्पताल पहुँच गया।
एक अनंत पीड़ा को जिन सजीव शब्दों में महावीर शर्मा ने पिरोया है लगता है जैसे यह सिर्फ कहानी के पात्रों की बात नहीं चल रही है, उन्होंने खुद इस दौर को जिया है. मेरी गज़ल का एक शेर इसी बात का जामिन हैः
ज़िंदगी को न मैं तो जी पाई
उसने ही मुझको है जिया जैसे.

” मैं जानता था …क्योंकि कोई सुनने वाला नहीं है, उस के अचेतन मन में पड़ी हुई पुरानी यादें चेतने पर आने के लिये जाने कब से सँघर्ष कर रही होगी, किंतु किसके पास इस बूढ़े की दास्तान सुनने के लिये समय नहीं है.” ( पढ़िये कहानी “वसीयत”) http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/M/MahavirSharma/vasiyat_kahani.htm)

http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/D/DeviNangrani/vseeysy_sameeksha.htm

मन का हर ज़र्रा इस सत्य को किसी भी तरह नकार नहीं पाता, पर हाँ, कड़वी दवा का घूँट समझकर सिर्फ निगलने की कोशिश कर सकता है. काल चक्र तो बिना आहट, बिना किसी को सूचित किये, स्वारंथ अस्वार्थ के दायरे के बाहर, दुख सुख की परंपरा को टोड़ता हुआ आगे बढता रहता है और ज़िंदगी के सफर में कहीं न कहीं कोई वक़्त जरूर दोहराया जाता है जहाँ तन्हाई का आलम इन्सान को घेर लेता है, जहाँ वह मकानों की भाँय भाँय करती दीवारों से पगलों की तरह बात करना उस आदमी की बेबसी बन जाती है. दुःख सुख का अहसास वहाँ कम होता है जहाँ उसको बाँटा जाता है, वर्ना उस कोहरे से बाहर निकलना बहुत मुशकिल हो जाता है. ऐसे हालात में बेबसी का सहारा बन जाते है आँसू. आँसुओं का भार जितना ज़्यादा दर्द उतना गहरा…….!! कहानी मन को छूकर उसके मर्म से पहचान करा जाती है जब याद की वादियों से तन्हा गुज़रना पड़ता है. एक वारदात दूसरी के साथ जुड़ती हुई सामने आ जा रही है.

“उस दिन मुझे माँ और ऐथल की बड़ी याद आई। मेरी आँख भर आई! पोते का नाम जॉर्ज वारन रखा.”
कहानी का बहाव मन की रवानी के साथ ऊँचाइयों से बहता हुआ मानव ह्रदय की सतह में आकर थम जाता है. लावा बनकर बह रहा है पिघलता हुआ दर्द, जिसकी पीड़ा का इज़हार कितनी सुंदरता से किया है महावीर जी ने अपने पीड़ित मन के शब्द सुरा से “हंसते खेलते एक साल बीत गया, इतनी कशमकश भरे जीवन में अब आयु ने भी शरीर से खिलवाड़ करना शुरू कर दिया था.”

इस कहानी की तार में पिरोया गया हर एहसास निराला है, बखूबी अहसासों का इज़हार शब्दों में दर्शाया है. “वसीयत” का एक पहलू बड़े ही निराले मोड़ पर आ खड़ा है जहां “विलामा” नामक उस सफेद बिल्ली का जि़क्र आया है. इन्सान और जानवर के संतुलन का संगम, क्रत्घनता और क्रत्घय्ता का एक सँगम महावीर शर्मा जी के शब्दों में…!!
” मैं उसे कहानी सुनाता और वह म्याऊँ म्याऊँ की भाषा में हर बात का उत्तर देती, मुझे ऐसा लगता जैसे मैं नन्हें जार्ज से बात कर रहा हूँ” (जार्ज इस कहानी के पात्र के रूप में उनका पोता है ) मर्म का क्षितिज देकिये..!

‘एक दिन वह जब बाहर गई और रात को वापस नहीं लौटी तो मैं बहुत रोया, ठीक उसी तरह जैसे जॉर्ज, विलियम और जैनी को छोड़ने के बाद दिल की पीड़ा को मिटाने के लिए रोया था। मैं रात भर विलमा की राह देखता रहा। अगले दिन वह वापस आ गई। बस, यही अंतर था विलमा और विलियम में जो वापस नहीं लौटा।
अभिलाषा अंतरमन के कलम की ज़ुबानी अश्कों की कहानी सुना रही है. अपने बच्चों की आस, प्यास बनकर रूह की ज़ुबान से टपक रही है. लपकते शोले मोम को पिघलाने के बजाय दिल को पत्थर भी बना देते हैं. दिल के नाज़ुक जज़्बे बर्फ की तरह सर्द भी पड़ जाते हैं. यह बखूबी दर्शाया गया है इस कहानी में.. धन राषि को धूल की तरह तोल कर लुटाया गया, जिससे न किसी के वक्त का मोल चुकाया जा सकता है, और ना ही किसी के अरमानों को आश्रय देने की कीमत. हाँ आँका गया मूल्य तो उस एक अनकहे लफ़्ज़ का था, उस अनसुने शब्द का था जो कहीं न कहीं अंदर ही घुटकर दफन हो गया था, पर स्नेह के थपथपाहट से कुछ पल धड़क कर जी उठा.
जीवन की सार्थकता जब सिसकती है तो दिल की आह एक वसीयत बन जाती है. बस वसीयत ही रह जाती है. वसीयत के अर्थ की विशालता शायद इन्सानी समझ समझने में असमर्थ है. जो आँखें देखती है, धन, दौलत, घर परिवार, ईंट गारे से बने महल जो न जाने किस खोखली बुनियाद पर बने है, जहाँ इन्सान नाकाम हो जाता है अपनी आने वाली अवस्था को देखने में, टटोलने में, जिसे वह आज सहला रहा है, सजा रहा है. आज जब कल का रूप धारण करेगा तब इतिहास दोहराया जायेगा. जहाँ वसीयत करने वाला लाचारी की शिला पर खड़ा है, उसी राह का पथिक हर एक को बनना है, उस बनवास के दौर से गुज़रना है तन्हा तन्हा.
अपना भविष्य उज्वल रखने वालों की चाह को सार्थक बनने और बनाने का बस एक यही साधन है कि आज का आदम कुछ पल अपनी इस मशीनी जिंदगी से निकाल कर खुद अपने परिवार के एक भी एकाकी सदस्य के मन में एक सखा भाव से झाँक कर देखे और उसे यह अहसास दिलाये कि वह अकेला नहीं है. वह तो एक भरपूर पुख़्ते परिवार का सहारा व स्थंभ है, जो शासक होते हुए बहुत कुछ दे तो सकता है पर कुछ भी ले नहीं सकता, सिवाय कुछ क्षणों के जिनकी कीमत वह वसीयत के रूप में चुका सकता है. हाँ चुका सकता है.

सितम्बर 15, 2007

“प्रवासिनी के बोल”

Filed under: Articles-English, समीक्षा — Devi Nangrani @ 3:16 अपराह्न

सँपादकः डॉ॰ अँजना सँधीर

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प्रिय अँजना,

महिलाओं का तू चितवन है
सुंदर और सलोना मधुबन है
तेरी सोच व शीरीं बातें
कितना उनमें अपनापन है
स्नेह स्वरूप ये “बोल” मिले
तेरे श्रम का ये दरपन है.

देवी नागरानी

डॉ॰ अंजना संधीर ने एक अनोखी विचार धारा को इस सँग्रह के रूप में साकार करके अनूप और अनोखा स्वरूप दिया है और एक सूत्र में पिरोकर प्रस्तुत किया है, लग रहा है जैसे नारी जाति के सन्मान में एक नया मयूर पँख लगा है. उनका दृढ़ सँकल्प ही इस काव्य सँग्रह “प्रवासिनी के बोल” के रूप में प्रकाशित हो पाया है.

“ख़्याल उसका हरेक लम्हा मन में रहता है
वो शम्मा बन के मेरी अंजुमन में रहता है
मैं तेरे पास हूं, परदेस में हूं, खुश भी हूं
मगर ख़्याल तो हर दम वतन में रहता है.” अँजना

अंजना जी के इस कथन में एक निचोड़ है, एक अनबुझी प्यास का अहसास जो सीने में कहीं न कहीं पनपता तो रहता है पर खिल नहीं पाता, खिलता है तो महक नहीं पाता, उस अनजान तड़प को उन्होंने शब्द दिये है “प्रवासिनी के बोल”. भरी आंखों और तड़पती हृदय वेदना परदेस में रहने वालों की, उनकी कलम की नोक से पीड़ा स्वरूप बहती सरिता बन कर सामने आई है. मुझे अपनी एक गज़ल के चंद शेर याद आ रहे हैः

इल्म अपना हुआ तो जान गई
मैं ही कुर्आन, मैं ही गीता हूँ.
है अयोध्या बसा मेरे मन में
वो तो है राम, मैं तो सीता हूं.
दर्द साँझा जो सबका है देवी
मैं उसी दर्द की कविता हूं.

अपने देश और संस्कृति से कट कर प्रवासी जीवन में जो उपलब्धि और विघटन होता है, उसे नारी ह्रदय महसूस करता है और भावनायें कलम का सहारा पाने से नहीं चूकती. जाने अनजाने में वो पद चिन्ह बनकर कहीं न कहीं अपनी छाप जरूर छोड़ जाती हैं, जो कभी न कभी साकार स्वरूप अख़त्यार कर लेती हैं.
एक फिलासफ़र शल्फ वाल्डो एमरसन के शब्दों में ” सीधा सीधा रास्ता पकड़कर न चलो, वहां चलो जहां कोई रास्ता या सड़क न हो. चलो और अपने पीछे एक पगडंडी छोड़ जाओ. ” इस विचार धारा को अंजना जी ने स्वरूपी जामा पहनाने का प्रयास किया है अपने श्रम परिश्रम के बलबूते पर, और साहित्य साधना की इस नई पगडंडी पर नारी जाति के मनोबल व सामर्थ्य को एक मुकाम पर लाने का बखूबी प्रयास किया है.

सारा आकाश नाप लेती है
कितनी ऊंची उड़ान है तेरी. देवी

जो स्वप्न अभी तक आंखों में तैरता रहा, उसकी नींव इस किताब के रूप में रक्खी है. देश से बाहर परदेस में, भाषा के विरोधी वातावरण में, अपनी हिंदी भाषा को कविता के माध्यम से जिंदा रखना अनुकूल क्रिया है. भाषा को ज़िंदा रखना हमारा कर्तव्य है, क्योंकि यह हमारे पास, आने वाली पीढ़ियों की धरोहर है . भाषा ज़िंदा है तो हम भी जिंदा रहेंगे. स्त्री मन को जागृत करके उसके मनोबल को पहचान देना एक साहस पूर्ण प्रयास ही नहीं, एक काबिले तारीफ कदम है, जो इतिहास के पन्नों पर उल्लेखनीय बन जाता है, और तो और भारत व अमरीकी हिंदी रचनाकारों के बीच एक सेतू बाँधने का श्रेय भी अंजना जी को जाता है.
इसी प्रयास को अँजनाजी ने एक बागबान की तरह दिन रात की मेहनत से सींचकर एक महकते हुए मधुबन का स्वरूप देकर अमरिका के नारी पक्ष को उजागर किया है. यहां पर वाली आसी साहब का शेर इस बात का सँपूर्ण गवाह हैः

हमने एक शाम चरागों से सजा रक्खी है
शर्त लोगों ने हवाओं से लगा रक्खी है
हम भी अंजाम की परवाह नहीं करते यारों
जान हमने भी हथेली पे उठा रक्खी है.

उसी साहस और शालीनता का उदाहरण एक परिपूर्ण ग्रंथ (An anthology connecting the East & the West) के रूप में “प्रवासिनी के बोल” कुल मिलाकर ६२२ पन्नों के रूप में मनोभावों से भरपूर आपके सामने आया है, जिसमें यू़.एस.ए में रहने वाली ८१ अमरीकी भारतीय हिंदी कवयित्रियों की ३२४ कविताएं पहले भाग में दी गई हैं, हिंदी से जुड़ी ३३ प्रतिभाशाली महिलाओं का सचित्र परिचय दूसरे भाग में दर्शाया गया है, तथा तीसरे भाग में अमरीका में अब तक प्रकाशित महिला साहित्यकारों की प्रकाशित पुस्तकों की यादि भी शामिल है. विदेश में रचा जा रहा साहित्य ही इस बात का प्रमाण है कि हम अपने देश से दूर जरूर है, पर देश हमसे दूर नहीं. दिल्ली से राजी सेठ का कथन है ” भाषा के घेरे से परे रहकर अपनी भाषा की, देश से परे रहकर देश की, परिवेश से परे रहकर देश के रँग- रूप, तीज-त्यौहार, मिथिक -इतिहास को रचने की प्रेरणा इन्हें कौन देता होगा?” उनके उत्तर में मेरी ये दो पँक्तियाँ हर नारी के ह्रदय की पुकार है, ललकार है.

दिल में देश बसाकर रक्खा हमनें
धड़कन बनकर खुद हम बसते उसमें. देवी

हमारा घर, उसका वातावरण, दिन चर्या में हमारा चलन, आपसी व्यहवार, हमारी भाषा और संस्कृति को बरक़रार रखने के लिये हिंदी भाषा का अनुकूल उपयोग एक योगदान है. साहित्य के वरदान को अलग – अलग अनुभूतियों को भिन्न-भिन्न स्वरूप में से सजाकर इस सँकलन में पिरोया गया है, जिनमें नारी हृदय के वात्सल्य के साथ करुणा, दया, प्रेम, सेवा के भाव लिये हुए अनेक मधुर ग़ज़ल, गीत, लोक गीत, कवितायें, तीज त्यौहार पर अपनी भावनाएं, अपने कोमल ह्रदय के ताने -बाने बुनते-बुनते कभी इन्हीं अहसासों को शब्दों का जामा पहना कर बड़ी सुंदरता से प्रस्तुत किया है नारी के तस्वुर को “वसुधा” के प्रकाशक व सम्पादक श्रीमती स्नेह ठाकुर ने बड़ी खूबी के साथ प्रस्तुत किया है, पः ६७
नारी
अशक हूं
वक्त की पलकों पर टिकी हूं
लहर हूं
सागर की बाहों में थमी हूं
शबनम हूं
ज़मीं के आगोश में बसी हूं
चिंगारी हूं
शोला बन कर भड़की हूं
किरण हूं
सूरज में समाई हूं
लता हूं
तन के सहारे बढ़ी हूं
नदी हूं
कगार के बँधन में बँधी हूं
फूल हूं
काँटों से उलझी हूं
कोमल हूं
रुई के फाहों से सहेजी जाती हूं
धरती हूं
अंबर के चँदोबे तले फली फूली हूं
अबला हूं
पुरुष की संरक्षता में रहती हूं
नारी हूं
पुरुष व पुरुषार्थ की जन्मदात्री हूं.

नारी मन आकाश से ऊँच्चा व पाताल से गहरा होता है यही सत्य है, क्योंकि नारी जन्मदात्री है, हर हाल में अपना आपा बनाये रखती है कारण कुछ भी हो. मेरी एक कविता “प्रदर्शन” का एक चित्र कुछ इसी तरह का है. पः २०३

दरिद्रता को ढाँपे
अपने तन के हर पोर में
वह नारी फिर भी,
कर रही है
प्रदर्शन अपना,
उन भूखी आँखों के सामने
जो आर पार होकर
छेद जाती है निरंतर
पर देख नहीं पाती
उस नारी का स्वरूप
जो एक जन्मदाता है
जीवन को बनाये रखती है
उसको सजाने के लिये
बलि तो दे सकती है
पर, ले नहीं सकती.

और सच तो यही है, एक कण कविता का एक युग को ज़ायकेदार बना सकता है, और भाव प्रकट करने का एक निर्मल माध्यम बन जाता. आनेवाली कई पीढियों तक औरत जाति के नाम के साथ अंजना जी का नाम भी जुड़ा रहेगा. इल्म का दान उत्तम दान है, इसके द्वारा विकास व प्रगति के कई नये रास्ते खुल जाते हैं, इस युग में वतन की मिट्टी से दूर निवास करने वाली भारत के हर कोने में बसने वाली नारी, जो विदेश में आ बसी है, इस “प्रवासिनी के बोल” में अपनी कलम की जुबानी अपने मन के भावों को, अपने अँदर पनपते अहसासों को जुबाँ दे पाई है. पर अंजना जी ने इन्हें एक सूत्र में बाँध कर एक महिला संगठन को एक नई रौशनी की नींव पर खड़ा किया है. इस आशावादी सँकल्प के बल पर प्रवासी कवयित्रियों की रचनाओं में, उनकी देश से दूर रहने की वेदना, कुछ अमरीका की खट्टी -मीठी अनुभूतियाँ, मन में उठती हर भावपूर्ण लहर को खुले मन से कविता द्वारा प्रकट करने के लिये यह क्रियाशील प्रयास किया है.
फिलास्फर इलेन लाइनर का कहना हैः ” अगर लेखक ये न लिखते कि उन्हें क्या महसूस हुआ तो बहुत सारे कागज़ ख़ाली होते”. इसी सच को यदि सामने रखा जाय तो देखने को मिलेगा, उन कवित्रियों के मन का मँथन, उनके अंदर की कोमलता, द्रढ़ता, वेदना, सँघर्ष, दुख, सुख, यादों की परछाइयां, मजबूरियाँ, तन्हाइयों के साथ बातें करने का अनुभव, देश के प्रति उमड़ते उनके ज़ज़बे जिनको इसी किताब से चुनकर मैंने यहां प्रस्तुत किया हैं. अँतरमन की वेदना कुसुम टँडन ने “बनवास” नामक कविता से छलकती हुई, पः १६५

रच गया एक इतिहास नया
फिर से इस नये ज़माने में
दे दिया है बनवास राम ने
माता पिता को अनजाने में.
॰॰
मेरी एक कविता “यादों का आकाश” यादों की दीवारों को खरोंच रहा है

मेरी यादों के आकाश के नीचे
दबी हुई है
मेरे ज़मीर की धरती,
थक चुकी है जो
बोझ उठाकर
अपने जे़हन के आँचल पर
झीनी चुनरिया जिसकी
तार तार हुई है
उन दरिंदों के शिकँजों से
उन खूँखार नुकीली नजरों से, जो
शराफत का दावा तो करते हैं
पर,
दुशवारियों को खरीदने का
सामान भी रखते हैं
बिक रहा है ज़मीर यहां
रिश्तों के बाजार में
बस बची है अंगारों के नीचे
दबी हुई कुछ राख
मेरे जिँदा जज्बों की
जो धाँय धाँय उड़कर
काला स्याह करती जा रही है
मेरे यादों के आकाश को.
॰॰
डॉ. प्रियदर्शिनी का अनुभव जिंदगी के बारे में उनकी ज़ुबानी, पः ३५
ज़िंदगी
नदी पर बना हुआ
लकड़ी का वह अस्थाई पुल है,
जिस पर हम
डगमगाते – डोलते
हिलोरें खाते
भयभीत
नीचे खाई में न झाँकने का प्रयास करते,
उस पार पहुँचने की ललक किये
चलते जाते हैं.
॰॰
बीना टोडी “मेरा अस्तित्व” में मन को टटोल रही है, पः३१२
करता है प्रशन अचानक मेरा मन
साये से क्या वजूद है मेरा
या है अस्तित्व साये का मुझसे?
॰॰
अँजना सँधीर के अपने अहसास कुछ यादों की परछाई बने हैं, पः ८४
चलो
एक बार फिर लिखें
खुशबू से भरे भीगे खत
जिन्हें पढ़ते पढ़ते भीग जाते हैं हम
इन्तज़ार करते थे डाकिये का हम
बँद करके दरवाज़ा
पढ़ते थे चुपके चुपके
वे भीगे ख़त तकिये पर सर रखकर.
॰॰
“फिर गा उठी प्रवासी” की रचनाकार लावन्य शाह, का कोमल मन झूमता हुआ. पः ४१५
पल पल जीवन बीता जाए
निर्मित मन के रे उपवन में
कोई कोयल गाये रे!
सुख के दुख के, पंख लगाये
कोई कोयल गाये रे!
॰॰
सारिका सक्सेना की कल्पना इँद्रधनुषी रूप धारण करती हुई उड़ रही है, पः४६०
तितली बन मन पँख पसारे
बिखरे रँग घनक के सारे.
शोख हवा से लेकर खुशबू
लिख दी पाती नाम तुम्हारे.
॰॰
मेरी अपनी एक आजाद कविता “सियासत” का अँग देश के जवानों को ललकार कर खून की लाली को चुनौती
दे रहा है कुछ इस तरहः
ऐ जवानो ! तुम बचालो
बरबादी के इस अणू से
आबादियों को आतिशों से
उठ के आगे तुम बढो, करलो
सामना तूफान का
करो कुछ काम ऐसा
अमन और शोहरत से मिलो…
॰॰
रजनी भार्गव के कोमल मन के अछूते अहसास “अभिमान” से , पः ३७०
आँगन में किलकती वीरानियां
जब तुलसी के आगे लौ में सुलगती है
कार्तिक की खुनक और लौ की गरमाहट- सा है
ये अभिमान मेरा.
॰॰
इला प्रसाद की जुबानी “यह अमेरिका है” पः १२१
रात भर चमकता रहा जुगनू
रह रह कर
किताबों की अलमारी पर,
हरी रौशनी, जलती रही, बुझती रही
मैं देखती रही, जब भी नींद टूटी
सोचती रही
“कल सुबह पकड़ूंगी
रख लूंगी शीशे के ज़ार में,
जैसे बचपन में रख लेती थी!”

इतने अनोखे अहसास, माध्यम कविता. इस नए सँचार की श्रृंखला शुरू करके अंजना जी ने बहुत ही गौरवपूर्ण उदाहरण कायम किया है. विश्व कवि रवींद्रनाथ का कथन, बरसों बाद भी उसी सच्च को ऐलान कर रहा है. वे कहा करते थे कि शांतिकेतन का रचनाशील विद्यार्थी जहां कहीं भी जायेगा वहां एक छोटा भारत निर्मित करेगा. याद आ रहा है कालिदास का “मेघदूत” जो सालों पहले पढ़ा था, मेघ अर्थात बादल जो दूत बनकर सँदेशा ले कर आते है. अँजनाजी का सफलपूर्ण प्रयास कविता की जुबानी पूरब और पश्चिम के बीच का सेतू बनकर यही सरमाया देगा, और इसी नज़रिये से यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि उन्होंने अमेरिका में एक छोटा भारत निर्मित करने का सफल प्रयास किया है.
कहा जाता है, हासिल की हुई कामयाबी अगर जग को अच्छी लगती है पर अपने मन को नहीं भाती, तो वह अधूरी कामयाबी होती है. पर इस रचना को रचयित करने में योगदान देने वाली हर नारी इस कामयाबी का हिस्सा है, जैसे एक परिपूर्ण परिवार का मिला जुला एक सफल यग्य है ” प्रवासिनि के बोल”. नई दिल्ली से डॉ॰ कमल किशोर गोयनका का कहना है ” इस संकलन का सब से बड़ा कार्य यह है कि इतनी प्रवासी हिंदी कवयित्रियाँ पहली बार हिँदी संसार के सम्मुख आ रही हैं और इतनी प्रकार की अनुभूतियाँ हमें मिल रही हैं. मेरे विचार में यह प्रयास स्तुत्य है, स्वागत के योग्य है.” इसी बात का समर्थन करते हुए मुझे भी ऐसे लगता है, इस किताब पर हर नारी के हर्दय से निकले बोल “प्रवासिनी के बोल” के रूप में जी उठे हैं. इसी संदर्भ में, मैं सारी नारी जाति की तरफ़ से अँजना जी को हार्दिक धन्यवाद देती हूं, और शुक्रगुजार हूँ जो मुझे भी अपने इस क्रियाशील अनुभव में अपने स्नेह के धागे में पिरोकर सन्मानित किया है.
मैं अपनी यह गज़ल जिसमें अँजना जी के इस किताब ने अहसास भरे है उन्हीं को अर्पित करती हूं. वतन की याद दिल में बसी रहे, याद के दिये झिलमिलाते रहें, चाहे हम देश में हों या देश से दूर पर जब तक साँस है आस यही रहेगी और यही रहेगी.

मेरे वतन की खुशबू

बादे-सहर वतन की चँदन सी आ रही है
यादों के पालने में मुझको झुला रही है.

ये जान कर भी अरमां होते नहीं हैं पूरे
पलकों पे ख़्वाब ‘देवी’ फिर भी सजा रही है.

कोई कमी नहीं है हमको मिला है सब कुछ
दूरी मगर वतन से मुझको रुला रही है.

पत्थर का शहर है ये, पत्थर के आदमी भी
बस ख़ामशी ये रिश्ते, सब से निभा रही है.

शादाब मेरे दिल में इक याद है वतन की
तेरी भी याद उसमें, घुलमिल के आ रही है.

‘देवी’ महक है इसमें, मिट्टी की सौंधी सौंधी
मेरे वतन की खुशबू, केसर लुटा रही है.

देवी नागरानी

शुभकामनाओं के साथ

देवी नागरानी

न्यू जर्सी, यू.एस.ए
नवँबर ५, २००६
Email: dnangrani@gmail.com
URL: <http://charagedil.wordpress.com&gt;
अँजना सँधीरः anjana_ sandhir@yahoo.com

सितम्बर 13, 2007

कठिन है मंज़िल का पाना उतना

Filed under: ग़ज़ल-दिल से दिल तक — Devi Nangrani @ 7:23 अपराह्न

ग़ज़ल: २
तवील जितना सफ़र ग़ज़ल का
कठिन है मंज़िल का पाना उतना.
ये कैसी ख़ुश्बू है सोच में जो
कि लफ्ज़ बनकर गुलाब महका.
कभी अंधेरों के साँप डसते
कभी उजाला न मन को भाता.
वो चुलबुलाहट, वो खिलखिलाहट
वो मेरा बचपन न फिर से लौटा.
कहीं तो मिलती नहीं है फ़ितरत
तो दिल से दिल भी कहीं है जुड़ता.
है दीप मंदिर का ये मेरा दिल
जो भक्ति के तेल से है जलता.
ये झूठ इतना हुआ है हावी
कि सच भी आकर गले में अटका.
गुमाँ हुआ ये क्षितिज पे देवी
ज़मीन पे यूँ आसमाँ है झुकता. ३०२

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