दिल से दिल तक

अक्टूबर 12, 2007

मुहब्बत की ईंटें न होती अगरचे

Filed under: ग़ज़ल-दिल से दिल तक — Devi Nangrani @ 5:20 अपराह्न

गज़लः 20

किसी को किसी से शिकायत न होती
अगर ये ज़माने में ग़ुरबत न होती.
मुहब्बत की ईंटें न होती अगरचे
तो रिश्तों की पुख़्ती इमारत न होती.
कभी ख़ौफ़ को हम ना पहचानते, गर
अदालत के ऊपर अदालत न होती.
ये बदनामियाँ, ये शरारत, ये उलझन
खुदा काश हमको ये आदत न होती.
ज़माने में इतनी न होती तरक्की
जो इन्सानियत की इबादत न होती.
सितारे, न धरती, न आकाश होता
जो दुनियाँ पे उसकी इनायत न होती.
दरिंदों में इन्साँ बदल जाते देवी
उसूलों की गर यूँ हिफ़ाज़त ना होती. १३०

Advertisements

टिप्पणी करे »

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं ।

RSS feed for comments on this post. TrackBack URI

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

WordPress.com पर ब्लॉग.

%d bloggers like this: