दिल से दिल तक

अक्टूबर 20, 2007

हम यक़ीनो- गुमां में रहते हैं

Filed under: ग़ज़ल-दिल से दिल तक — Devi Nangrani @ 5:26 अपराह्न

गजलः 25

 झूठ के साथ सच ये कैसे हैं
हम यक़ीनो- गुमां में रहते हैं.

दिल में अहसास भी कुछ ऐसे हैं
मुझको अक्सर वो जिंदा रखते हैं.

ग़म की बुनियाद पर है गुलशन जो
उस चमन में भी फूल खिलते हैं.

उलझी उलझी सी हूं यहाँ मैं भी
उलझे उलझे वहां वो रहते हैं.

आईना राजदां रहा अपना
हम अकेले में बात करते हैं.

ठोकरों से बचाके दुनिया की
खुद को महफूज़ यूं भी रखते हैं.

सोचती हूं उन्हें भी तज दूं आज
वक्त बेवक्त़ जो उलझते हैं. १५५

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