दिल से दिल तक

दिसम्बर 9, 2008

अभिमत -‘महर्षि’

Filed under: समीक्षा — Devi Nangrani @ 4:25 पूर्वाह्न
अभिमत
ये कैसी ख़ुशबू है सोच में जो
कि लफ्ज़ बन कर गुलाब महका
देवी नागरानी जी ने यह महकता हुआ शे’र तो कहा ही है, साथ ही ‘महक’ को लेकर उन्होंने एक अन्य शेर भी कहा है जो मा’नी – आफरीनी (अर्थ के चमत्कार) का एक उत्कृष्ट नमूना है तथा असाधारण एवं अलौकिक है । इस प्रसंग में संत कबीर का एक दोहा प्रस्तुत है, जो यहाँ बहुत ही प्रासंगिक है –
कस्तूरी कुंडलि बसे, मृग ढूँढे वन माहिं
ऐसे घटि -घटि राम है, दुनिया देखे नाहिं
अर्थात् मृग की नाभि में जो कस्तूरी है उसकी सुगंध से मृग व्याकुल हो उठता है, परन्तु वह यह नहीं जानता कि वह मस्त-मस्त महक उसकी नाभि में भरी कस्तूरी से आ रही है और वह उसे ढूँढने के लिए वन-वन भटकता फिरता है जैसे प्रभु घट-घट में बसे हुए हैं, परन्तु दुनिया उन्हें देख नहीं पाती और इधर-उधर भटकती रहती है । अब देखें कि देवी नागरानी जी ने अपनी तरंग में कस्तूरी की सुगंध से भी कहीं अधिक बढ़कर किस अलौकिक सुंगध की बात अनायास ही कह दी है , जिससे कदाचित् वे स्वयं भी अनजान हैं, जैसे उनसे कोई पूछ रहा हो ?
महकी -महकी फिरती ‘देवी
क्या तेरे दिल में मधुवन है ?
सहज भाव से कहा गया उनका यह विस्मयकारी शेर इतना अलौकिक है कि बस देखते ही बनता है । महक और वह भी मधुवन की! उस मधुवन की जो भगवान श्रीकृष्ण की पावन रासलीलाओं की स्थली रही है, यह पौराणिक मिथकों (उर्दू में देवमालाई तल्मीहात) का कमाल है, जो ग़ज़ल की दो पंक्तियों को इतना विस्तृत एवं अर्थपूर्ण बना देते हैं, जिससे हम चमत्कृत एवं विमुग्ध हो उठते हैं, क्योंकि मिथकों में कोई न कोई ऐसी पौराणिक कथा अंतर्निहित होती है जो हमें दिव्य अनुभूति का आनंद प्रदान करती है ।
देवी नागरानी जी का प्रथम हिंदी ग़ज़ल-संग्रह चराग़े-दिल पिछले वर्ष ही प्रकाशित हुआ था जिसका समारोहपूर्ण लोकार्पण बांद्रा स्थित हिंदू एसोसिएशन हॉल में २२ अप्रैल, २००७ को सम्पन्न हुआ था और अब आश्चर्यजनक रूप से, वर्ष २००८ में ही उनका यह दूसरा हिंदी ग़ज़ल संग्रह दिल से दिल तक प्रकाशित होकर लोकार्पित होने को है, इसके साथ ही सिंधी भाषा में उनका दूसरा ग़ज़ल-संग्रह भी लोकार्पण के लिए तैयार है। वे निश्चय ही इन दोनों नई कृतियों की प्रस्तुति के लिए बधाई की पात्र हैं। इस प्रकार चराग़े-दिल की प्रस्तावना में मेरा कहा हुआ निम्नांकित कथन पूर्णतया सत्य सिद्ध हुआ है-नागरानी की ये तो शुरूआत है
और होने को ग़ज़लों की बरसात है
हैं अभी और उनसे उमीदें बहुत
उनके दिल में बड़ा शोरेजज़्बात है
इस संबंध में उनके सद्य प्रकाशित ग़ज़ल संग्रह दिल से दिल तक से उद्धृत उनकी ये ताज़ातरीन पंक्तियाँ भी द्रष्टव्य हैं
कुचल डालो चाहे, मुझे मार डालो
रुकेगी न मेरे कलम की रवानी
देवी जी भी आख़िर क्या करें
दर्द की टीस जब उठे दिल में
रास्ता कौन रोके अश्कों का
और फिर ग़ज़ल ऐसी महबूब विधा है कि जो एक बार उसका हुआ, सदा उसका होकर ही रह जाता है-
न वो उसको छोड़े , न ‘देवी’ उसे
है तन्हाइयों की सहेली ग़ज़ल
उनके अनुसार – ‘ग़ज़ल की बुनियाद, विधा एवं छंद-शास्त्र (इल्मे-अरूज़) की अनगिनत बारीकियों पर बना एक भवन है जिसमें कवि अपने मनोभाव, उद्गार, विचार, दुख-दर्द, अनुभव तथा अपनी अनुभूतियाँ सजाता है । एक अनुशासन का दायरा होता है पर उसका विस्तार अनंत की ओर खुलता है। ग़ज़ल आत्मा का अमर गीत है जो अतृप्त मन में तृप्ति का आनन्द देता है । उनकी तलाशे -नौ-ब-नौ अभी जारी है –
मैं तो झूठा गवाह हूँ यारो
झूठ को भी मैं कैश करता हूँ
डोलियों की जगह हैं अब कारें
लद गये दिन वो अब कहारों के
कुछ दवा का, दुआ का असर देखिये
मौत को यूँ छकाती रही ज़िंदगी
लड़खड़ाई जबां सच को कहते हुए
झूठ के सामने यूँ डरी ज़िंदगी
तअक्कुब में क्यों उनके तूफां हैं ‘देवी
सफीनों से ऐसी भी क्या दुश्मनी है
दर्ज इतिहास में तो हूँ लेकिन
फिर भी मुझको भुला रहे हो तुम
सम्प्रति न्यूजर्सी
(अमेरिका) निवासी देवी नागरानी जी पत्र-पत्रिकाओं तथा इंटरनेट के माध्यम से देश -विदेश, विशेषकर भारत, पाकिस्तान और अमेरिका में, ख़ासी चर्चित हो रही हैं और क्यों न हों, वे प्रतिभाशाली व्यक्तित्व और बहुमुखी कृतित्व की स्वामिनी जो हैं ।यह हमारे लिए बहुत ही प्रसन्नता की बात है । ग़ज़ल का उनका यह सुहाना सफर , आगे भी सतत जारी रहे, उनकी नौ-ब-नौ की जुस्तजू सफलीभूत हो तथा उनका यह सद्य प्रकाशित ग़ज़ल संग्रह दिल से दिल तक भी चराग़े -दिल की तरह पाठकों में चर्चा का विषय बने और लोकप्रिय अर्जित करे, यही हमारी हार्दिक कामना है –
हो अगर मखमली ग़ज़ल ‘महरिष
क्यों न उसका हो कद्रदां रेशम
आर. पी. शर्मा ‘ ‘महर्षि’ ’ए-१, वरदा, कीर्ति कॉलेज के निकट, वीर सावरकर मार्ग, दादर (प.), मुंबई – ४०० ०२८ (महा.)

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