दिल से दिल तक

अक्टूबर 26, 2010

महर्षि की ग़ज़लें

Filed under: ग़ज़ल-महर्षि जी की — Devi Nangrani @ 2:07 पूर्वाह्न

ग़ज़ल-5 

लाया था जो हमारे लिये जाम, पी गया

क़ासिद हमारे नाम का पैग़ाम पी गया

 

कुछ इस तरह सुनाई हमें उसने दास्तां

आया जो इख़्तिताम, तो अंजाम पी गया

 

पलकों पे कोई दीप जलाये तो किस तरह

आंसू बचे थे जो दिले-नाकाम पी गया

 

लेले के नाम सबको पुकारा किया, मगर

साकी को देखिये कि मेरा नाम पी गया

 

‘महरिष’, ये दर्द, रिदे-बलानोश है कोई

सब दिन का चैन, रात का आराम पी गया

 

—–

 ग़ज़ल-6

 नाकर्दा गुनाहों की जिली यूं भी सज़ा है

साकी नज़र-अंदाज़ हमें करके चला है

क्या होती है ये आग भी, क्या जाने समंदर

कब तिश्नालबी का उसे एहसास हुआ है

 

उस शख्स के बदले हुए अंदाज़ तो देखो

जो टूटके मिलता था, तकल्लुफ से मिला है

 

पूछा जो मिज़ाज उसने कभी राह में रस्मन

रस्मन ही कहा मैंने कि सब उसकी दुआ है

 

महफ़िल में कभी जो मिरी शिरकत से ख़फ़ा था

महफ़िल में वो अब मेरे न आने से ख़फा है

 

क्यों उसपे जफाएं भी न तूफान उठाएं

जिस राह पे निकला हूं मैं, वो राहे-वफ़ा है

 

पीते थे न ’महरिष, तो सभी कहते थे ज़ाहिद

अब जाम उठाया है तो हंगामा बपा है।

 

ग़ज़ल-7

 

इरादा वही जो अटल बन गया है

जहां ईंट रक्खी, महल बन गया है

 

ख़्याल एक शाइर का आधा-अधूरा

मुकम्मल हुआ तो ग़ज़ल बन गया है

 

कहा दिलने जो शेर भी चोट खाकर

मिसाल इक बना, इक मसल बन गया है

 

पुकारा है हमने जिसे‘आज’कह कर

वही‘वक्त’कम्बखत‘कल’बन गया है

 

ये दिल ही तो है, भरके ज़ख्मों से‘महरिष’

खिला, और खिल कर कमल बन गया है

 

—–

 

ग़ज़ल-8

 

मस्त सब को कर गई मेरी ग़ज़ल

इक नये अंदाज़ की मेरी ग़ज़ल

 

एक तन्हाई का आलम, और मैं

पेड़-पौधों ने सुनी मेरी ग़ज़ल

 

खाद-पानी लफ्ज़ो-मानी का जिला

ख़ूब ही फूली-फली मेरी ग़ज़ल

 

जब कभी जज़्बात की बारिश हुई

भीगी-भीगी-सी हुई मेरी ग़ज़ल

 

फूंकती है जान इक-इक लफ्ज़ में

शोख़, चंचल, चुलबुली, मेरी ग़ज़ल

 

ये भी है मेरे जिये राहत की बात

जांच में उतरी खरी मेरी ग़ज़ल

 

आया ‘महरिष’, शेर कहने का शऊर

मेहरबां मुझ पर हुई मेरी ग़ज़ल

महर्षि की ग़ज़लें

Filed under: ग़ज़ल-महर्षि जी की — Devi Nangrani @ 12:25 पूर्वाह्न

आर.पी. शर्मा ( उपनाम ‘महरिष’)

प्रकाशित पुस्तकें

1.    हिंदी ग़ज़ल संरचना – एक परिचय

      (सन् 1984 में मेरे द्वारा इल्मे – अरूज़ (उर्दू छंद-शास्त्र)

      का सर्वप्रथम हिंदी में मौलिक रूपांतरण)

2.    ग़ज़ल-निर्देशिका

3.    ग़ज़ल-विधा

4.    ग़ज़ल-लेखन कला

5.    व्यावहारिक छंद-शास्त्र (पिंगल और इल्मे-अरूज़ के तुलनात्मक विश्लेषण       सहित)

6.    नागफ़नियों ने सजाईं महफ़िलें (ग़ज़ल-संग्रह)

ग़ज़ल-3

बहारें हैं फीकी, फुहारें हैं नीरस

न मधुमास ही वो, न पहली-सी पावस

हवाएं भी मैली, तो झीलें भी मैली

कहां जाएं पंछी, कहां जायें सारस

उन्हें चाहिये एक सोने की लंका,

न तन जिनके पारस, न मन जिनके पारस

वो सम्पूर्ण अमृत-कलश चाहते हैं

कि है तामसी जिन का सम्पूर्ण मानस

जो व्रत तोड़ते हैं फ़कत सोमरस से

बड़े गर्व से ख़ुद को कहते हैं तापस

हुआ ईद का चांद जब दोस्त अपना

तो पूनम भी वैसी कि जैसी अमावस

अखिल विश्व में ज़ेहर फैला है‘महरिष’

बने नीलकंठी, है किसमें ये साहस

—–

ग़ज़ल-4

उनका तो ये मज़ाक रहा हर किसी के साथ

खेले नहीं वो सिर्फ़ मिरी ज़िंदगी के साथ

आज़ाद हो गये हैं वो इतने, कि बज़्म में

आए किसी के साथ, गए हैं किसी के साथ

अपनों की क्या कमी थी कोई अपने देश में

परदेश जा बसे जो किसी अजनबी के साथ

फिरते रहे वो दिल में ग़लतफहमियां लिये

ये भी सितम हुआ है मिरी दोस्ती के साथ

‘महरिष’वो हमसे राह में अक्सर मिले तो हैं,

ये और बात है कि मिले बेरूख़ी के साथ

वर्डप्रेस (WordPress.com) पर एक स्वतंत्र वेबसाइट या ब्लॉग बनाएँ .