दिल से दिल तक

अक्टूबर 26, 2010

महर्षि की ग़ज़लें

Filed under: ग़ज़ल-महर्षि जी की — Devi Nangrani @ 12:25 पूर्वाह्न

आर.पी. शर्मा ( उपनाम ‘महरिष’)

प्रकाशित पुस्तकें

1.    हिंदी ग़ज़ल संरचना – एक परिचय

      (सन् 1984 में मेरे द्वारा इल्मे – अरूज़ (उर्दू छंद-शास्त्र)

      का सर्वप्रथम हिंदी में मौलिक रूपांतरण)

2.    ग़ज़ल-निर्देशिका

3.    ग़ज़ल-विधा

4.    ग़ज़ल-लेखन कला

5.    व्यावहारिक छंद-शास्त्र (पिंगल और इल्मे-अरूज़ के तुलनात्मक विश्लेषण       सहित)

6.    नागफ़नियों ने सजाईं महफ़िलें (ग़ज़ल-संग्रह)

ग़ज़ल-3

बहारें हैं फीकी, फुहारें हैं नीरस

न मधुमास ही वो, न पहली-सी पावस

हवाएं भी मैली, तो झीलें भी मैली

कहां जाएं पंछी, कहां जायें सारस

उन्हें चाहिये एक सोने की लंका,

न तन जिनके पारस, न मन जिनके पारस

वो सम्पूर्ण अमृत-कलश चाहते हैं

कि है तामसी जिन का सम्पूर्ण मानस

जो व्रत तोड़ते हैं फ़कत सोमरस से

बड़े गर्व से ख़ुद को कहते हैं तापस

हुआ ईद का चांद जब दोस्त अपना

तो पूनम भी वैसी कि जैसी अमावस

अखिल विश्व में ज़ेहर फैला है‘महरिष’

बने नीलकंठी, है किसमें ये साहस

—–

ग़ज़ल-4

उनका तो ये मज़ाक रहा हर किसी के साथ

खेले नहीं वो सिर्फ़ मिरी ज़िंदगी के साथ

आज़ाद हो गये हैं वो इतने, कि बज़्म में

आए किसी के साथ, गए हैं किसी के साथ

अपनों की क्या कमी थी कोई अपने देश में

परदेश जा बसे जो किसी अजनबी के साथ

फिरते रहे वो दिल में ग़लतफहमियां लिये

ये भी सितम हुआ है मिरी दोस्ती के साथ

‘महरिष’वो हमसे राह में अक्सर मिले तो हैं,

ये और बात है कि मिले बेरूख़ी के साथ

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