दिल से दिल तक

मार्च 21, 2011

मेरा वजूद

Filed under: आज़ाद-कविता — Devi Nangrani @ 4:22 अपराह्न

सोच की हदों के बाँध तोड़कर

सरहदों के उस पार

मेरा वजूद

फिर नए सिरे से खड़ा है

सोच की तरह खामोश

खोया खोया सा

तलाशता है वो जुबां

जो कह सके

बेमतलब के हैं वो शब्द सारे

जो परिचय के लिए बांधे हैं

देवी नागरानी

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यह पल

Filed under: आज़ाद-कविता — Devi Nangrani @ 4:18 अपराह्न

कल

 और आज के बीच का

यह पल मेरा है 

और यही वह समय है

 

जिसमें

 मैं उस  सचाई से परिचित हुई हूँ

कि मैं वो नहीं  

जो कुछ करती हूँ

 

करता कोई और है 

मैं वो नहीं जो सुनती हूँ

सुनता कोई और है 

मैं वो नहीं जो जीती हूँ

जीता कोई और है 

मैं तो खुद को जीवित रखने के लिए

 

रोज़ मरती हूँ 

देवी नागरानी

 

मैं कौन हूँ?

Filed under: आज़ाद-कविता — Devi Nangrani @ 4:10 अपराह्न

मैं वो कविता हूँ

जो कोई कलम न लिख पाई

रात के सन्नाटों में

तन्हाइयों का शोर

ज्वालामुखी बन कर उबल पड़ा

इक दर्द जो सदियों से

चट्टान बनकर मेरे भीतर जम गया था

वही पिघलकर

एक पारदर्शी लावा बनकर बह गया

जब मैं खाली हुई

तब जाकर जाना कि मैं कौन हूँ

देवी नागरानी

 

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