दिल से दिल तक

अप्रैल 14, 2011

आर.पी. शर्मा ‘महरिष’

Filed under: ग़ज़ल-महर्षि जी की — Devi Nangrani @ 5:16 अपराह्न

 गज़ल-10 

यूं पबन, रुत को रंगीं बनाये

ऊदी-ऊदी घटा लेके आये

भीगा-भीगा-सा ये आज मौसम

गीत-ग़ज़लों की बरसात लाये

 ख़ूब से क्यों न फिर ख़ूबतर हो

जब ग़ज़ल चांदनी में नहाये

दिल में मिलने की बेताबियां हों

फ़ासला ये करिश्मा दिखाये

साज़े-दिल बजके कहता है‘महरिष’

ज़िंदगी रक़्स में डूब जाये

—–

ग़ज़ल-11

नाम दुनिया में कमाना चाहिये

कारनामा कर दिखाना चाहिये

 

चुटकियों में कोई फ़न आता नहीं

सीखने को इक ज़माना चाहिये

 

जोड़कर तिनके परिदों की तरह

आशियां अपना बनाना चाहिये

 

तालियां भी बज उठेंगी ख़ुद-ब-ख़ुद

शेर कहना भी तो आना चाहिये

 

लफ्ज़‘महरिष’, हो पुराना, तो भी क्या?

इक नये मानी में लाना चाहिये

—–

ग़ज़ल-12

क्यों न हम दो शब्द तरुवर पर कहें

उसको दानी कर्ण से बढ़कर कहें

 

विश्व के उपकार को जो विष पिये

क्यों न उस पुरुषार्थ को शंकर कहें

 

हम लगन को अपनी, मीरा की लगन

और अपने लक्ष्य को गिरधर कहें

 

है ‘सदाक़त’ सत्य का पर्याय तो

“ख़ैर” शिव को‘हुस्न’को सुंदर कहें

 

तान अनहद की सुनाये जो मधुर

उस महामानव को मुरलीधर कहें

 

जो रिसालत के लिए नाजिल हुए

बा-अदब, हम उनको पैगंबर कहें

 

बंदगी को चाहिये‘महरिष’मक़ाम

हम उसे मस्जिद कि पूजाघर कहें

—–

ग़ज़ल-13  हिचकियाँ

जैसी तुम से बिछुड़ कर मिलीं हिचकियाँ

ऐसी मीठी तो पहले न थीं हिचकियाँ

 

याद शायद हमें कोई करता रहा

दस्तकें दरपे देती रहीं हिचकियाँ

 

मैंने जब-जब भी भेजा है उनके लिए

मेरा पैग़ाम लेकर गईं हिचकियाँ

 

फासला दो दिलों का भी जाता रहा

याद के तार से जब जुड़ीं हिचकियाँ

 

जब से दिल उनके ग़म में शराबी हुआ

तब से हमको सताने लगीं हिचकियाँ

 

उनके ग़म में लगी आंसुओं की झड़ी

रोते-रोते हमारी बंधीं हिचकियाँ

 

उनको ‘महरिष’, जिरा नाम लेना पड़ा

तब कहीं जाके उनकी रुकीं हिचकियाँ

—–

ग़ज़ल-14

जाम हम बढ़के उठा लेते, उठाने की तरह

क्यों न पीते जो पिलाते वो पिलाने की तरह

 

तुम ठहरने को जो कहते, तो ठहर जाते हम

हम तो जाने को उठे ही थे, न जाने की तरह

 

कोई आंचल भी तो हो उनको सुखाने के लिए

अश्क तब कोई बहाए भी, बहाने की तरह

 

टीस कहती है वहीं उठके तड़पती-सी ग़ज़ल

दिल को जब कोई दुखाता है, दुखाने की तरह

 

गर्मजोशी की  तपिश भी तो कुछ उसमें होती

हाथ ‘महरिष’, जो मिलाते वो मिलाने की तरह

—–

ग़ज़ल-15

गीत ऐसा कि जैसे कमल चाहिये

उसपे भंवरों का मंडराता दल चाहिये

 

एक दरिया है नग़्मों का बहता हुआ

उसके साहिल पे शामे-ग़ज़ल चाहिये

 

जिसको जीभर के हम जी सकें, वो हमें

शोख़, चंचल, मचलता-सा पल चाहिये

 

और किस रोग की है दवा शाइरी

कुछ तो मेरी उदासी का हल चाहिये

 

ख़ैर, दो-चार ही की न ‘महरिष’ हमें

हम को सारे जहां की कुशल चाहिये

 

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वतन की याद आती है

Filed under: ग़ज़ल‍-देवांगन — Devi Nangrani @ 4:52 अपराह्न

ग़ज़लः 1

जुदाई से नयन है नम, वतन की याद आती है

बहे काजल न क्यों हरदम, वतन की याद आती है

समय बीता बहुत लंबा हमें परदेस में रहते

न उसको भूल पाए हम, वतन की याद आती है

तड़पते हैं, सिसकते हैं, जिगर के ज़ख़्म सीते हैं

ज़ियादा तो कभी कुछ कम, वतन की याद आती है

चढ़ा है इतना गहरा रंग कुछ उसकी मुहब्बत का

हुए गुलज़ार जैसे हम, वतन की याद आती है

यहाँ परदेस में भी फ़िक्र रहती है हमें उसकी

हुए हैं ग़म से हम बेदम, वतन की याद आती है

हमारा दिल तो होता है बहुत मिलने मिलाने का

रुलाते फ़ासले हमदम,  वतन की याद आती है

वही है देश इक ‘देवी’ अहिंसा धर्म है जिसका

लुटाता प्यार की शबनम, वतन की याद आती है.

देवी नागरानी

कर गई लौ दर्दे-दिल की इस तरह रौशन जहाँ

Filed under: ग़ज़ल‍-लौ दर्दे-दिल की — Devi Nangrani @ 4:37 अपराह्न

ग़ज़लः

कर गई लौ दर्दे-दिल की इस तरह रौशन जहाँ

कौंधती है बादलों में जिस तरह बर्क़े-तपाँ

साँस का ईंधन जलाया तब कहीं वो लौ जली

देखकर जिसको तड़पती रात की बेचैनियाँ

वो जली जलकर बुझी, फिर ख़ुद-ब-ख़ुद ही जल उठीं

बुझ न पाई शम्अ दिल की, आईं कितनी आंधिया

उतनी ही गहराई में वो गिरता है ख़ुद ही एक दिन

खोदता जितना जो औरों के लिए गहरा कुआँ

खो गया था कल जो बचपन, आज फिर लौट आया है

गूंज उठी आंगन में मेरे फिर वही किलकारियाँ

बेज़ुबां क्या कह रहा हैकुछ सुनो, समझो ज़रा

अनसुना करके न लादो उनपे ज़िम्मेदारियाँ

मेंने मौसम की पढ़ी अख,बार में ‘ देवी’  ख़बर

थी ख़बर ये, बाढ़ में ,हफूज़ था मेरा मकाँ

देवी नागरानी

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