दिल से दिल तक

दिसम्बर 9, 2008

अभिमत -‘महर्षि’

Filed under: समीक्षा — Devi Nangrani @ 4:25 पूर्वाह्न
अभिमत
ये कैसी ख़ुशबू है सोच में जो
कि लफ्ज़ बन कर गुलाब महका
देवी नागरानी जी ने यह महकता हुआ शे’र तो कहा ही है, साथ ही ‘महक’ को लेकर उन्होंने एक अन्य शेर भी कहा है जो मा’नी – आफरीनी (अर्थ के चमत्कार) का एक उत्कृष्ट नमूना है तथा असाधारण एवं अलौकिक है । इस प्रसंग में संत कबीर का एक दोहा प्रस्तुत है, जो यहाँ बहुत ही प्रासंगिक है –
कस्तूरी कुंडलि बसे, मृग ढूँढे वन माहिं
ऐसे घटि -घटि राम है, दुनिया देखे नाहिं
अर्थात् मृग की नाभि में जो कस्तूरी है उसकी सुगंध से मृग व्याकुल हो उठता है, परन्तु वह यह नहीं जानता कि वह मस्त-मस्त महक उसकी नाभि में भरी कस्तूरी से आ रही है और वह उसे ढूँढने के लिए वन-वन भटकता फिरता है जैसे प्रभु घट-घट में बसे हुए हैं, परन्तु दुनिया उन्हें देख नहीं पाती और इधर-उधर भटकती रहती है । अब देखें कि देवी नागरानी जी ने अपनी तरंग में कस्तूरी की सुगंध से भी कहीं अधिक बढ़कर किस अलौकिक सुंगध की बात अनायास ही कह दी है , जिससे कदाचित् वे स्वयं भी अनजान हैं, जैसे उनसे कोई पूछ रहा हो ?
महकी -महकी फिरती ‘देवी
क्या तेरे दिल में मधुवन है ?
सहज भाव से कहा गया उनका यह विस्मयकारी शेर इतना अलौकिक है कि बस देखते ही बनता है । महक और वह भी मधुवन की! उस मधुवन की जो भगवान श्रीकृष्ण की पावन रासलीलाओं की स्थली रही है, यह पौराणिक मिथकों (उर्दू में देवमालाई तल्मीहात) का कमाल है, जो ग़ज़ल की दो पंक्तियों को इतना विस्तृत एवं अर्थपूर्ण बना देते हैं, जिससे हम चमत्कृत एवं विमुग्ध हो उठते हैं, क्योंकि मिथकों में कोई न कोई ऐसी पौराणिक कथा अंतर्निहित होती है जो हमें दिव्य अनुभूति का आनंद प्रदान करती है ।
देवी नागरानी जी का प्रथम हिंदी ग़ज़ल-संग्रह चराग़े-दिल पिछले वर्ष ही प्रकाशित हुआ था जिसका समारोहपूर्ण लोकार्पण बांद्रा स्थित हिंदू एसोसिएशन हॉल में २२ अप्रैल, २००७ को सम्पन्न हुआ था और अब आश्चर्यजनक रूप से, वर्ष २००८ में ही उनका यह दूसरा हिंदी ग़ज़ल संग्रह दिल से दिल तक प्रकाशित होकर लोकार्पित होने को है, इसके साथ ही सिंधी भाषा में उनका दूसरा ग़ज़ल-संग्रह भी लोकार्पण के लिए तैयार है। वे निश्चय ही इन दोनों नई कृतियों की प्रस्तुति के लिए बधाई की पात्र हैं। इस प्रकार चराग़े-दिल की प्रस्तावना में मेरा कहा हुआ निम्नांकित कथन पूर्णतया सत्य सिद्ध हुआ है-नागरानी की ये तो शुरूआत है
और होने को ग़ज़लों की बरसात है
हैं अभी और उनसे उमीदें बहुत
उनके दिल में बड़ा शोरेजज़्बात है
इस संबंध में उनके सद्य प्रकाशित ग़ज़ल संग्रह दिल से दिल तक से उद्धृत उनकी ये ताज़ातरीन पंक्तियाँ भी द्रष्टव्य हैं
कुचल डालो चाहे, मुझे मार डालो
रुकेगी न मेरे कलम की रवानी
देवी जी भी आख़िर क्या करें
दर्द की टीस जब उठे दिल में
रास्ता कौन रोके अश्कों का
और फिर ग़ज़ल ऐसी महबूब विधा है कि जो एक बार उसका हुआ, सदा उसका होकर ही रह जाता है-
न वो उसको छोड़े , न ‘देवी’ उसे
है तन्हाइयों की सहेली ग़ज़ल
उनके अनुसार – ‘ग़ज़ल की बुनियाद, विधा एवं छंद-शास्त्र (इल्मे-अरूज़) की अनगिनत बारीकियों पर बना एक भवन है जिसमें कवि अपने मनोभाव, उद्गार, विचार, दुख-दर्द, अनुभव तथा अपनी अनुभूतियाँ सजाता है । एक अनुशासन का दायरा होता है पर उसका विस्तार अनंत की ओर खुलता है। ग़ज़ल आत्मा का अमर गीत है जो अतृप्त मन में तृप्ति का आनन्द देता है । उनकी तलाशे -नौ-ब-नौ अभी जारी है –
मैं तो झूठा गवाह हूँ यारो
झूठ को भी मैं कैश करता हूँ
डोलियों की जगह हैं अब कारें
लद गये दिन वो अब कहारों के
कुछ दवा का, दुआ का असर देखिये
मौत को यूँ छकाती रही ज़िंदगी
लड़खड़ाई जबां सच को कहते हुए
झूठ के सामने यूँ डरी ज़िंदगी
तअक्कुब में क्यों उनके तूफां हैं ‘देवी
सफीनों से ऐसी भी क्या दुश्मनी है
दर्ज इतिहास में तो हूँ लेकिन
फिर भी मुझको भुला रहे हो तुम
सम्प्रति न्यूजर्सी
(अमेरिका) निवासी देवी नागरानी जी पत्र-पत्रिकाओं तथा इंटरनेट के माध्यम से देश -विदेश, विशेषकर भारत, पाकिस्तान और अमेरिका में, ख़ासी चर्चित हो रही हैं और क्यों न हों, वे प्रतिभाशाली व्यक्तित्व और बहुमुखी कृतित्व की स्वामिनी जो हैं ।यह हमारे लिए बहुत ही प्रसन्नता की बात है । ग़ज़ल का उनका यह सुहाना सफर , आगे भी सतत जारी रहे, उनकी नौ-ब-नौ की जुस्तजू सफलीभूत हो तथा उनका यह सद्य प्रकाशित ग़ज़ल संग्रह दिल से दिल तक भी चराग़े -दिल की तरह पाठकों में चर्चा का विषय बने और लोकप्रिय अर्जित करे, यही हमारी हार्दिक कामना है –
हो अगर मखमली ग़ज़ल ‘महरिष
क्यों न उसका हो कद्रदां रेशम
आर. पी. शर्मा ‘ ‘महर्षि’ ’ए-१, वरदा, कीर्ति कॉलेज के निकट, वीर सावरकर मार्ग, दादर (प.), मुंबई – ४०० ०२८ (महा.)
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जून 17, 2008

कल्पना और भाषा की अद्भुत पकड़

Filed under: Articles-English, समीक्षा — Devi Nangrani @ 4:15 अपराह्न
श्रीमती देवी नागरानी जी के अब तक दो ग़ज़ल संग्रह ग़म में भीगी ख़ुशी और चराग़ेदिल प्रकाशित हो चुके हैं। अपनी संवेदना और भाषा की काव्यात्मकता के कारण देवी जी संवेदनशील रचनाकार कही जा सकती हैं। देवी जी अपने इस नये ग़ज़ल संग्रह में ग़ज़लों को कुछ इस अंदाज़ से कहती हैं कि पाठक पूरी तरह उन में डूब जाता है। विचारों के बिना भाव खोखले दिखाई देते हैं। इस संग्रह में भावों और विचारों का सुंदर सामंजस्य होने के कारण यह पुस्तक सारगर्भित बन गई है।
शाइर ज़िन्दगी की जटिलताओं के बीच अपने संघर्ष का इज़हार करने के लिए एक उपकरण ढूंढता है जो देवी जी की ग़ज़लों में अभिव्यक्त हुई है। देवी जी तकनीकी नज़ाकतों से भी भली भांति परिचित हैं। ज़िन्दगी अक्सर सीधीसादी नहीं हुआ करती। उन्होंने लंबे संघर्षों के बीच अपनी राह बनाई हैः
जिसे लोग कहते हैं जिंदगी
वो तो इतना आसां सफ़र नहीं.

तवील जितना सफ़र ग़ज़ल का
कठिन है मंज़िल का पाना उतना.

नारी से जुड़े हुए गंभीर सवालों को उकेरने और समझाने के लिए उनके पारदर्शी प्रयास से ग़ज़लों के फलक का बहुत विस्तार हो गया है। फिर भी स्त्रीमन की तड़प, चुभन और अपने कष्टों से झूझना, समाज की रुग्ण मानसिकता आदि स्थितियों की परतें खोल कर रख देना तथा अपनी रचनाओं की अंतरानुभूति के साथ पाठकों को बहा ले जाती हैं:

कैसी दीमक लगी है रिश्तों की

रेज़े देवी है भाईचारों के

 

 

 

.

नारी के जीवन की पीड़ा, संघर्ष और अस्तित्व की पहचान भी कराती हैं:
ये है पहचान एक औरत की

माँ बाहन, बीवी, बेटी या देवी.
ग़ज़ल कहने की अपनी अलग शैली के कारण देवी जी की ग़ज़लों की रंगत कुछ और

ही हो जाती है। अतीत का अटूट हिस्सा हो कर यादों के साथ पहाड़ जैसे वर्तमान
को भी देख सकते हैं:
कुछ न कुछ टूटके जुड़ता है यहाँ तो यारो

हमने टूटे हुए सपनों को बहुत ढोया है

 

इम्तिहाँ ज़ीस्त ने कितने ही लिए हैं देवी
उन सलीबों को जवानी ने बहुत ढोया है.

उनकी शब्दावली, कल्पना और भाषा की अद्भुत पकड़ देखिएः
मुहब्बत की ईंटें न होती अगरचे
तो रिश्तों की पुख़्ता इमारत न होती.

 

वो सोच अधूरी कैसे सजे
लफ़्ज़ों का लिबास ओढ़े न कभी.
आज की शाइरी अपने जीवन और वक्त के बीच गुज़रते हुए तरक्की कर रही है। समय की यातना से झूझती है, टकराती है और कभी कभी लाचार हालत में तड़प कर रह जाती हैः
ज़िदगी से जूझना मुशकिल हुआ इस दौर में
ख़ुदकुशी से ख़ुद को लेकिन मैं बचाकर आई हूँ

 

वक्ते आखिर आ के ठहरे है फरिश्ते मौत के
जो चुराकर जिस्म से ले जायेंगे जाने कहाँ.

उनकी ग़ज़लों के दायरे का फैलाव सुनामी जैसी घटनाओं के समावेश करने में देखा जा सकता है, जिसमें आर्द्रता है, मानवीयता हैः

 

सुनामी ने सजाई मौत की महफ़िल फ़िज़ाओं में
शिकारी मौत बन कर चुपकेचुपके से कफ़न लाया.
आज धर्म के नाम पर इंसान किस तरह पिस रहा है। धनलोलुपता के कारण धर्म के रक्षक ही भक्षक बन कर धर्म और सत्य को बेच रहे हैं। इस ग़ज़ल के दो मिस्रों को देखिएः

मौलवी पंडित खुदा के नाम पर
ख़ूब करते है तिजारत देखलो

 

दाव पर ईमान और बोली ज़मीरों पर लगी
सौदेबाज़ी के नगर में बेईमानी दे गया.
निम्नलिखित पंक्तियों में अगर ग़ौर से देखा जाए तो यह आईना उनके अंदर का आईना है या वक्त का या फिर महबूब का जिसके सामने खड़े होकर वो अपने आप को पहचानतीं हैं :
मुझको सँवरता देखके दर्पण

मन ही मन शरमाया होगा.
इन अशा में गूंजती हुई आवाज़ उनकी निजी ज़िन्दगी से जुड़ी हुई है। कितनी ही यातनाएं भुगतनी पड़े, पर वे हार नहीं मानती, बस आगे बढ़ती जाती हैं:
पाँव में मजबूरियों की है पड़ी ज़ंजीर देवी

चाल की रफ़्तार लेकिन हम बढ़ाकर देखते हैं.

 

हौसलों को न मेरे ललकारो
आँधियों को भी पस्त कर देंगे.
जीवन के लंबे अथक सफ़र पर चलते चलते देवी जी ज्यों ही मुड़ कर अतीत में देखती हैं तो बचपन के वो क्षण ख़ुशी देकर दूर कहीं अलविदा कहते हुए विलीन हो गयाः
वो चुलबुलाहट, वो खिलखिलाहट
वो मेरा बचपन न फिर से लौटा.

आशा है कि देवी नागरानी जी का यह ग़ज़लसंग्रह ग़ज़ल साहित्य में अपना उचित स्थान पायेगा। हार्दिक शुभकामनाओं सहित
महावीर शर्मा

7 Hall Street, London, North Finchley, N12, 8DB. UK

नवम्बर 22, 2007

“ग़ज़ल कहता हूँ”

Filed under: समीक्षा — Devi Nangrani @ 9:53 अपराह्न

पुस्तक विचार
शाइरः प्राण शर्मा
प्रकाशकः अनिभव प्रकाशन,
ई-२८, लजपतनगर,
साहिबाबाद. उ.प्र.
मूल्यः १५०
पन्नेः ११२

“ग़ज़ल कहता हूँ”

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श्री प्राण शर्मा ग़ज़ल विधा के संसार में एक जाने माने उस्ताद है जिन्होने अपनी शैली और सोच को शिल्पकार की तरह अपने ढंग से ढाला है. आए दिनों उनके लेख गज़ल के बारे में पढ़ने को मिलते है जो नये लिखने वालों के लिये मार्गदर्शक बनते चले जा रहे हैं. आपके द्वारा लिखा गया “हिंदी ग़ज़ल बनाम उर्दू ग़ज़ल” धारावाहिक रूप में हमारे सामने आता रहा और पथ दर्शक बन कर वह कई ग़ज़ल विधा की बारीकियों पर रोशनी डालते हुए बड़ा ही कारगर सिद्ध हुआ. उसी के एक अंश में आइये सुनें वो ग़ज़ल के बारे में क्या कहते हैं -“अच्छी ग़ज़ल की कुछ विशेषताएं होती हैं. इन पर समय के साथ के चलते हुए विशेषग्यता हासिल की जाये तो उम्दा ग़ज़ल कही जा सकती है. साथ ही इनका अभाव हो तो ग़ज़ल अपना प्रभाव खो देती है या ज़्यादा लोकप्रिय नहीं हो पाती. सरल, सुगम एवं कर्णप्रिय शब्दों में यदि हिंदी ग़ज़ल लिखी जायेगी तो प्रश्न ही पैदा नहीं होता कि वह जन मानस को न मथ सकें. यदि ग़ज़ल में सर्वसाधारण के समझ में आने वाली कर्ण प्रिय मधुर शब्द आएंगे तो वह न केवल अपनी भीनी- भीनी सुगंध से जनमानस को महकाएगी बल्कि अपनी अलग पहचान बनायेगी. हिंदी ग़ज़ल को लोकप्रिय बनाने के लिये उसको बोलचाल या देशज शब्दावली को चुनना होगा, जटिल ग़ज़ल की वकालत को छोड़ना होगा. “

जब किसी रचनाकार की साहित्य रुचि किसी एक खास विधा में हो और वह उसके लिये जुस्तजू बन जाये तो वहाँ लेखन कला साधना स्वरूप सी हो जाती है. ऐसी ही एक स्थिती में अंतरगत प्राण शर्मा जी ने अपने इस ग़ज़ल संग्रह के आरंभ में लिखा है जिसे पढ़ कर सोच भी यही सोचती है कि किस जमीन की बुनियाद पर इस सोच की शिला टिकी होगी, किस वीचार के उत्पन होने से, उसके न होने तक का फासला तय हुआ होगा. विचार की पुख़्तगी को देखिये, सुनिये और महसूस कीजिये.

“ग़ज़ल कहता हूँ तेरा ध्यान करके
यही ए प्राण अपनी आरती है.”

अद्भुत, सुंदरता की चरम सीमा को छूता हुआ एक सच. यही भावार्थ लेकर एक शेर मेरी गज़ल का इसी बात की सहमति दे रहा है

“दिल की दुनियाँ में जब मैं डूबी रही
कहकशाँ में नज़र आ गया कहकशाँ.” स्वराचित

“एक आसमान जिस्म के अंदर भी है
तुम बीच से हटों तो नज़ारा दिखाई दे.” गणेश बिहारी तर्ज़

नज़रिया एक पर हर लफ़्ज अपने अपने भाव से शेर में पिरोये हुए तालमेल का अंतर अपनी अपनी द्रष्टि से अलग- अलग ज़ाहिर कर रहा है, जैसे कोई अपने वजूद की गहराइयों में डूबकर, बहुत कुछ टटोलकर प्रस्तुत करता है जिसमें कथ्य और शिल्प दोनों साकार हो जाते हैं. निशब्द सोच, शब्दों का सहारा लेकर बोलने लगती है, चलने लगती है. यही आकार एक अर्थपूर्ण स्वरूप धारण करके सामने आ जाता है एक कलाकार की कलात्मक अर्चना की तरह.

सीप में मोती
स्वास स्वास में राम
बसा हो जैसे…. स्वरचित हाइकू

यूँ मानिये कि अपनी अपनी सोच के परों पर सवार होकर प्राण जी का मन शब्दों के जाल बुनता है, उधेड़ता है और फिर बुनता है कुछ यूँ कि वो छंद के दाइरे में जहाँ कभी तो आसानियाँ साथ देती है, कहीं तो बस कशमकश के घेराव में छटपटाहट ही होने लगती है, जब तक सोच का एक मिसरा दूसरे मिसरे के साथ नियमानुसार ताल मेल नहीं खाता. ग़ज़ल लिखने के कुछ अपने कायदे हैं, कुछ रस्में है, उनका अपना एक लहज़ा होता है. उन्हीं के साथ इन्साफ करते हुए अपनी तबीयत की फिक्र को किस तरह ज़ाहिर कर रहे हैं, गौर फरमायें, सुनते है उनके ही शब्दों में-

“ढूँढ लेता मैं कहीं उसका ठिकाना
पाँव में पड़ते न छाले सोचता हूँ.

प्राण दुख आए भले ही जिंदगी में
उम्र भर डेरा न डाले सोचता हूँ.” ५१

किसीने खूब कहा है ‘कवि और शब्द का अटूट बंधन होता है. कवि के बिना शब्द तो हो सकते हैं, परंतु शब्द बिना कवि नहीं होता. एक हद तक यह सही है, पर दूसरी ओर ‘कविता’ केवल भाषा या शब्द का समूह नहीं. उन शब्दों का सहारा लेकर अपने अपने भावों को भाषा में व्यक्त करने की कला गीत-गज़ल है. ये तजुरबात की गलियों से होकर गुज़रने का सफर उम्र की मौसमें को काटने के बाद कुछ और ही गहरा होने लगता है, हकी़कतों से वाकिफ कराता हुआ. सोच का निराला अंदाज़ है, शब्दों का खेल भी निराला, कम शब्दों की पेशकश, जिससे साफ़ ज़ाहिर होता है वह ग़ज़ल की लेखन कला की माहिरता और उनकी सोच की परवाज़ सरहदों की हदें छूने के लिये बेताब है. बस शब्द बीज बोकर अपनी सोच को आकार देते हैं, कभी तो सुहाने सपने साकार कर लेते हैं, तो कहीं अपनी कड़वाहटों का ज़हर उगल देते हैं. सुनते हैं जब गमों के मौसम आते हैं तो बेहतरीन शेर बन जाते हैं. अब देखिये प्राण जी का एक गज़ल का मतला, जहाँ उनके अहसास सांस लेने लगते है, जैसे इनमें प्राण का संचार हुआ हो. बस शब्द बीज के अंकुर जब निकलते हैं तो सोच भी सैर को निकलती है, हर दिशा की रंगत साथ ले आती है. सोच का परिंदा पर लगाकर ऊंचाइयों को छू जाता है, तो कभी ह्रदय की गहराइयों में डूब जाता है. वहाँ पर जिस सच के साथ उसका साक्षातकार होता है उसी सत्य को कलम की जुबानी कागज़ पर भावपूर्ण अर्थ के साथ पेश कर देता है. अब देखिये प्राण जी एक गज़ल का मक्ता इसी ओर इशारा कर रहा है:

छूप में तपते हूए, ए प्राण मौसम में
सूख जाता है समन्दर, कौन कहता है.

“हिंदी ग़ज़ल बनाम उर्दू ग़ज़ल” धारावाहिक में उनका संकेत ग़ज़ल की अर्थपूर्ण संभावनाओं को प्रस्तुत करते समय क्या होता है और क्यों होता है कहते हुए प्राण शर्मा जी की जुबानी सुनें क्या फरमाते हैं- “अच्छे शेर सहज भाव, स्पष्ट भाषा और उपयुक्त छंद में सम्मिलन का नाम है. एक ही कमी से वह रसहीन और बेमानी हो जाता है. भवन के अंदर की भव्यता बाहर से दिख जाती है. जिस तरह करीने से ईंट पर ईंट लगाना निपुण राजगीर के कौशल का परिचायक होता है, उसी तरह शेर में विचार को शब्द सौंदर्य तथा कथ्य का माधुर्य प्रदान करना अच्छे कवि की उपलब्धि को दर्शाता है. जैसे मैंने पहले यह लिखा है कि यह उपलब्धि मिलती है गुरू की आशीष तथा परिश्रम अभ्यास से. जो यह समझता है कि ग़ज़ल लिखना उसके बाएं हाथ का खेल है तो वह भूल-भुलैया में विचरता है तथा भटकता है. सच तो यह है कि अच्छा शेर रचने के लिये शायर को रातभर बिस्तर पर करवटें बदलनी पड़ती है. मैंने भी लिखा है” –

सोच की भट्टी में सौ सौ बार दहता है
तब कहीं जाके कोई इक शेर बनता है.६१

किसी हद तक यह ठीक भी है. शिल्पकारी में भी कम मेहनत नहीं करनी पड़ती है. मेरा एक शेर

” न दीवार पुख़्ती वहाँ पर खड़ी है
जहाँ ईंट से ईंट निस दिन लड़ी है”

कभी गर्व से ऊँचा सर है किसीका
कभी शर्म से किसकी गरदन झुकी है” – देवी

बकौल शाइर डा॰ कुँअर बेचैन ने इस ग़ज़ल संग्रह कि प्रस्तावना को एक नये व अनोखे अंदाज से पेश किया है, हाँ कूब इन्साफ भी किया है उनकी शैली उनकी दार्शनिकता के विस्तार के साथ खूब इन्साफ किया है. उनका प्राण जी की ग़ज़ल के साथ साक्षातकार होना, और फिर उसके साथ गुफ्तगू का सिलसिला इतना रोचक और जानदार लगा कि शुरू करने के बाद समाप्ति की ओर बढ़ती चली गई और फिर तो सोच का नतीजा आपके सामने है. सोच की उड़ान आसमाँ को छेदने की शिद्दत रखती है. छोटे बहर में बड़ी से बड़ी बात कहना इतना आसान नहीं. यह तो एक शिल्पकला है. ग़ज़ल लिखना एक क्रिया है, एक अनुभूति है जो ह्रदय में पनपते हुए हर भाव के आधार पर टिकी होती है. एक सत्य यह भी है कि यह हर इन्सान की पूंजी है, शायद इसलिये कि हर बशर में एक कलाकार, एक चित्रकार, शिल्पकार एवं एक कवि छुपा हुआ होता है. किसी न किसी माध्यम द्वारा सभी अपनी भावनाएं प्रकट करते हैं, पर स्वरूप सब का अलग अलग होता है. एक शिल्पकार पत्थरों को तराश कर एक स्वरूप बनाता है जो उसकी कल्पना को साकार करता है, चित्रकार तूलिका पर रंगों के माध्यम से अपने सपने साकार करता है और एक कवि की अपनी निश्बद सोच, शब्दों का आधार लेकर बोलने लगती है तो कविता बन जाती है, चाहे वह गीत स्वरूप हो या रुबाई या गज़ल. देखिये प्राण जी की इस कला के शिल्प का एक नमूना-

प्राण दुख आए भले ही जिंदगी में
उम्र भर न डाले डेरा सोचता हूँ.

काव्यानुभव में ढलने के लिये रचनाकार को जीवन पथ पर उम्र के मौसमों से गुज़रना होता है और जो अनुभव हासिल होते है उनकी प्राण जी के पास कोई कमी नहीं है. जिंदगी की हर राह पर जो देखा, जाना, पहचाना, महसूस किया और फिर परख कर उनको शब्दों के जाल में बुन कर प्रस्तुत किया, उस का अंदाज़ देखिये इस शेर में-

झोंपड़ी की बात मन करिये अभी
भूखे के मुंह में निवाला चाहिये. ५७

हम भी थे अनजान माना आदमियत से मगर
आदमी हमको बनाया आदमी के प्यार ने.५६

उनकी शैली उनके चिंतन मनन के विस्तार से परिचित कराते हुए प्राण जी के शौर हमें इस कदर अपने विश्वास में लेते हैं कि हमें यकीन करना पड़ता है कि उनकी शाइरी का रंग आने वाली नवोदित कवियों की राहों में अपनी सोच के उजाले भर देगा. लहज़े में सादगी, ख्याल में संजीदगी और सच्चाइयों के सामने आइना बन कर खड़ा है. हर राज का पर्दा फाश करते हुए प्राण जी के शेर के सिलसिले अब काफिले बन रहे है जो अपने साथ एक पैग़ाम लिये,बिन आहट के खामोशियों के साथ सफर करते हुए अपने मन के गुलशन में उमडते हुए भारतीयता के सभी रंग, वहाँ की सभ्यता, संस्क्रुति, तीज त्यौहार, परिवेश, परंपराओं की जलतरंग से हमारी पहचान कराते चले जा रहे हैं.
उनका ये ग़ज़ल संग्रह ” मैं ग़ज़ल कहता हूँ” . बोलचाल की भाषा में अपने मन के भाव प्रकट करने के इस सलीके से मैं खुद बहुत मुतासिर हुई हूँ और आशा ही नहीं यकीन के साथ कह सकती हूँ कि उनका यह सँग्रह लोगों की दिलों में अपना स्थान बनाता रहेगा.
“मेरी राह रौशन करें आज देवी
यही वो दिये है, यही वो दिये हैं.”- स्वराचित

जाते जाते एक अनुपम शेर उनकी जुबानी-

“रोशनी आए तो कैसे घर में
दिन में भी हर खिड़की पर परदा है प्यारे.”

देवी नागरानी
न्यू जर्सी, यू.एस.ए
१० , अक्टूबर २००७
dnangrani@gmail.com
URL://charagedil.wordpress.com

“है यहाँ भी जल”

Filed under: समीक्षा — Devi Nangrani @ 9:43 अपराह्न

पुस्तक चर्चा
लेखकः विजय सिंह नाहटा
प्रकाशक : बोधि प्रकाशन, जयपुर
मूल्य : १००/
पन्नेः ९०
सम्पर्क : vijay_nahata@hotmail.com

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“है यहाँ भी जल”


विजय सिंह नाहटा , जयपुर के निवासी हैं और बहुत ही सधे हुए जाने माने कवि है जिनका शुमार देश के मान्यवर कवियों में होता है. राजस्थान पंशासनिक सेवा में वे निवर्त हैं. कल हमारा, सेतु, दूर कहीं आदि समवेत काव्य संग्रहों में उनकी रचनायें संकलित है. प्रसार भारती एवम् दूरदर्शन से निरंतर रचनाओं का अनुप्रसारण भी होता रहता है.
“है यहाँ भी जल” उनका पहला कविता संग्रह है.

विजय सिंह नाहटा जी का प्रथम कविता संग्रह मेरे हाथ जब आया तो कुछ पल के लिये मैं उस किताब को हाथों में लिए सोचती रही, जाने क्या? पर कुछ ऐसा उस कवर पेज के चित्र में संबोधित था, जिसे मेरी आँखें देख तो पा रही थी, पर पढ़ नहीं पा रही थी. स्याह स्याह श्यामल रंग, उस पर अंकित दो आंखें, ऐसा कहीं लगता भी था, कहीं भ्रम होने का इशारा भी मिलता था, अन्तर मन के अदृश्य कुछ अनदेखे दृश्य खुली आँखों के सामने न जाने किन तहों को बे-परदा करते रहे. और जैसे ही मेरे भ्रम की पहली तह खुली आसमानी अदृश्यता के इशारे, कुछ गहराइयों से झाँकती सच्चाइयों की झलकी सामने उस पन्ने पर नज़र आई जो मेरे सामने खुला-

” आत्मा-सा मंडराता हुआ”

‘शब्द जो दिखता प्रकट
शब्द का आवरण होता सशरीर, स्थूल
उसके भीतर गहरे होता एक शब्द
चेतना की तरह पसरा हुआ-
अदृश्य, निराकार!!

शब्द जो दिखता है
होती झिलमिलाहट भीतर के शब्द की
शब्द जो प्रकट ज्योति की तरह
उजास है उस शब्द की
नहीं आया जो कविता में
आत्मा-सा मंडराता हुआ, हे बार !” प.३०

पल दो पल के लिए खामोशी ने मेरी सोच के लब सी दिए, सुन्न निशब्द! ऐसा कभी कभार होता है, जब कोई साहित्य सिर्फ़ शब्द न होकर कुछ और होता है, जो अपने अंदर के सच के सामने अक्स बन कर खडा हो जाता है. ऐसी ही शिद्दत, सुन्दरता, संकल्प विजय जी की इस रचना में पाई इन अल्फाज़ों से जाँकती हुई. अंतर्मन के सच का साक्षात्कार, सच के शब्दों में लिखा हुआ यह एक प्रयास ही नहीं, एक सफल दृष्टिकोण भी है जो इंसान को इस सच के आगाज़ के दाइरे में लाकर खड़ा करता है. जीवन पथ पर लक्ष्य के इर्द गिर्द यह दृष्टिकोण नक्षत्र सा मंडराता हुआ नज़र आता है. एक ध्वनि गूंजित होती सुनायी पड़ रही है जैसे उनके अपने शब्दों में

” आत्मा से बाहर निकल कर ख़ुद को सज्जाता हूँ”

शब्द स्वरूप मोती मन को मोह के दाइरे में ला कर खड़ा कर देते हैं. गौतम बुद्ध की जीवन गति भी बेताश होकर उस सच को तलाशती हुई गाया पहुँची और उन्हें मोक्ष का साक्षात्कार हुआ. सेल्फ रीअलाइज़ेशन मकसद है, बाकी सब पड़ाव है उस अदृश्य निराकार दृश्य के.

विजय जी की कलम से सच की धारा बन कर बहत चला जा रहा है. उनकी सोच प्रगतिशील है और एक मार्गदर्शक भी. वो शब्दों का सहारा लेकर उस शब्द की ओर इशारा कर रहे हैं जो इस रचना का आधार है-इस शरीर में प्राण फूंकता है, जो अग्नि बनकर देह में ऊर्जा देता है. कविता रुपी देह के गर्भ से इस प्रकाश का जन्म होना एक अभिव्यक्ति है, जहाँ शब्द शब्द न रहकर एक ध्वनि बन जाए और आत्मा सा मंडराता रहे. बहूत मुबारक सोच है जो लक्ष को ध्येय मान कर शब्दों की उज्वलता को कविता में उज्गार कर रही है. यहाँ मैं विजय जी के शब्दों में एक संदेश ख़ुद को और सच की राह पर चलने वाले अध्यात्मिल उड़ान भरने वालों के आगे प्रस्तुत कर रही हूँ. यह संदेश गीता का सार है, और ज्ञान का निचोड़ भी.

“मैं कल सुबह
तुम्हारी याद को
इतिहास की तरह पढ़ूँगा. प३१

और आगे तो अनेक रहस्यों के द्वार खटखटाने का सिलसिला दिखाई पड़ रहा है, जहाँ नज़र पड़ती है, शब्द पढ़ कर आँख कुछ पल थम सी जाती है, सोच पर बल पड़ने लगते हैं कि कैसे यह रचनाकार अपनी रचना के ज़रिये हमें एक ऐसी स्रष्टी की सैर को ले चला है, जहाँ पाठक के सामने कुछ अनसुने, कुछ अनदेखे अन्तर के राज़ फाश होते जा रहे हैं. अब आगे देखें कुछ और शब्दों का ताल-मेल, उनकी स्वच्छता के साथ!!

” संभावनाओं की आहट से सुंदर
असम्भावनों की किसी मलिन-सी गली में
दिर्मूद से यकायक मिल बैठते हों बचपन के दोस्त! ” प१९

शब्द थपकी देकर जगा रहे हैं, संभावनाओं से दूर असम्भावानाओं के दायरे में एक संकरी गली से गुज़र कर जिस साक्षात्कार की कल्पना का मुझे अहसास दिला गई, तो अनायास ये शब्द मेरी कलम से बह निकले:

“अब रूह में उतरकर मोटी समेट देवी
दिल सीप बन गया है और सोच भी खुली है.” -स्वरचित

यह तो मैं नहीं जानती की पढ़ने से जो आभास मेरे अंदर उठ रहे है वो बेशक रूहानी सफर की ओर बखूबी संकेत कर रहे. आगे देखिये औए सुनिए शब्दों की आवाज़ को:

” जब तुम न थीं
तो प्रतीक्षा थी
अब तुम हो
मैं ढूंढता हूँ प्रतीक्षा को. प.२१

शब्द की गहराइयों में एक विरह भाव प्रतीत होता है, जैसे अपने आप से मिलने के लिए लेटा हो कोई, जीवित चिता पर मरने के इंतिज़ार में. अपने आपको जानने, पहचानने की, और उस सत्यता में विलीन होने की प्रतीक्षा ऐसी ही होती होगी जिसकी विजय जी को तलाश है. बड़ी ही मुबारक तलाश है यह , ज़हे नसीब!!

“फिसलती हुई रेत है जिंदगानी
तमाशा है ये भी मगर चार दिन का.” -स्वरचित

सफर का सिलसिला एक और पड़ाव पर आकर ठहरना चाहता है कुछ पल, सोच में डूबा कि शब्द भी इतनी खूबसूरती से अपने होने का ऐलान कर सकते हैं.

-“तुम्हारी स्मृति अब एक रड़कती मुझमें ?
राख के इस सोये ढेर में
ज्यों दिपदिपाता एक अंगारा मद्धम
सोये हुए चैतन्य में
लो तुम अचानक देवता सी
जग गई मुझमें
जगाती अलख निरंजन!” प २४

अंतःकरण से आती हुई कोई आलौकिक आवाज़, जैसे कोई गूँज भंवर गुफा की गहराइयों से बुला रही हो, अपने पास-निद्रा में अनिद्रा का पैग़ाम लिए:

छन छन छन छन
रुन झुन रुन झुन
पायल की झन्कार लिए !!

वाह!!! एक सुंदर चित्र सजीव सा खींचने का सफल प्रयास, मन की भावनाओं का सहारा लेकर कवि विजय की कलम इस सार्थक रवानी को लिये थिरकती है जिसके लिये मैं उन्हें तहे दिल से शुभकामनाएं देती हूँ. मन की आशा बहुत कुछ पाकर भी कुछ और पाने की लालसा में निराशाओं को अपने आलिंगन में भरने को तैयार है.

“घेरा है मस्तियों ने तन्हाइयों को मेरी
महसूस हो रहा है फ़िर भी कोई कमी है”-स्वरचित

यादों की सँकरी गली के घेराव में एक बवंडर उठ रहा है जहाँ साँस धधकती है जलती चिता पर जीते जी लेटे उस इन्तज़ार में, जहाँ मौत के नाम पर आत्मा के अधर जलने लगे है, उस पनाह को पाने के लिये.

“जिंदगी ‌एक आह होती है
मौत जिसकी पनाह होती है.” -स्वरचित

हर पन्ने पर शब्द निशब्द करते चले जा रहे हैं और झूठ का एक एक आवरण सच में तब्दील होता जा रहा है. जैसे:

” समृति गोया गिलहरी
काल के उजाड़ सन्नाटे तले
फुदकती
इस डाल से उस डाल!” प २२

एक खालीपन का अहसास अपने भरपूर आभास के साथ फुदकता हुआ नज़र आ रहा है. जो मैं महसूस कर रही हूँ, जो पदचाप शब्दों की मैं सुन रही हूँ, जो अक्स मैं इन शब्दों के आईने में देख रही हूँ, ज़रूरी नहीं कोई मुझसे शामिल राय हो. कवि जब लिखता है तो उस समय उसके मन की स्थिति, उसके भाव, उसके ह्रदय की वेदना, विरह का अवस्थिती, मिलने की आशा, निराशाओं की जकड़न उसके सामने सोच बनकर आ जाती है, और लिखते लिखते वो कहीं न कहीं उस छटपटाहट को छुपाने या दर्शाने में कामयाब हो जाता है, यही एक लिखने की सफल कोशिश है जो अनबुझी प्यास को लेकर सहरा में भटकते हुए एक कवि, एक शायर, एक लेखक, शिल्पकार, एवं एक कलाकार को अपनी रचना को सजीव करने का वरदान देती है.

“सुनसान जब हो बस्तियां, रहती वहाँ तन्हाइयां
अब मैं जहाँ पर हूँ बसी, संग में रहे परछाइयाँ” -स्वरचित

अरे ये क्या सामने ही लिखा है?

” क्षण वह लौट नहीं आएगा
मौन तोड़ता हुआ फुसफुसाएगा. ” प २३

लगता है तन्हाइयां बोल रही हैं. वक्त फिसलती हुई रेत की तरह जा रहा है और हमारी बेबसी उसे देखे जा रही है जिसका इशारा इस शेर में बखूबी झलक रहा है:

” नहीं बाँध पाया है कोई समय को
न देखा कभी हमने ऐसा करिश्मा.”-स्वरचित

विजय जी की हर पंक्ति अपने आप में एक जुबां है, मौन तोड़ती हुई, फुसफुसाती हुई. बस उन खामोशियों को सुनने वाले कानों की ज़रूरत है.

“गुफ्तगू हमसे वो करे ऐसे
खामोशी के लब खुले जैसे.”-स्वरचित

बस अहसास जिंदा हो, शब्द अपने आप बोलने लगते हैं, कभी तो शिद्दत के साथ चीखने भी लगते हैं. ऐसी ही इस सुंदर रचनात्मक अनुभूति के रचयिता श्री विजय जी ने बड़े अनोखे ढंग से अपने अँदर के लहलहाते भावों के सागर को, शब्दों का सहारा लेकर अलौकिक रूप से व्यक्त किया है. कभी किसी कड़वाहट को पीने की घुटन के बाद, कभी इंतज़ार के बाद थकी थकी सी आँखों की पथराहट की ज़ुबानी, कहीं आकुल तड़प की चट्टान बैठी उस विरहन की जुबानी, तो कहीं सहरा की तपती रेत पर चलते चलते पाँव के छालों की परवाह किए बिन ही पथिक जिस पथ पर अपने ही वजूद की तलाश में भटक रहा है -उस आत्मीय मिलन की प्यास लिए हुए-इन सभी अहसासों को शब्दों की सरिता स्वरूप पेश करने की सफल कोशिश की है. ज़िंदगी का एक सिरा अपनी अनंत यात्रा की ओर बढ़ते हुए दूसरे सिरे को टटोलने लगता है तो विजय जी के शब्दों में:

” मृत्य अलार्म घड़ी है,
पर जिसकी चाब्बी हम नहीं लगाते
हमें जगह कर पकडा देगी
दूसरी यात्रा की गाड़ी. ” प ७०

इस पुस्तक के हर शब्द को पढ़ते हुए, उसे समझने, समझकर पचाने की कोशिश में मेरी अपनी सोच लिखने के धारा को रोक नहीं पा रही है. इस प्रयास में कहीं एक और किताब ही न बन जाए इसी डर से अनुमति लेने के लिए सिमटाव की मेरी इस कोशिश में कुछ शेर मौत की ओर इशारा करते हुए पेश हैं.

” मौत का मौसम न कोई, न ही इसका वक्त है
ये चुराकर रूह को ले जाए है जाने कहाँ.”

गुज़ारी ज़िंदगी बेहोश होकर मैंने दुनियाँ में
मेरा विश्वास सदियों से न जाने किस गुमाँ पर था.?

कोई गया जहाँ से तो आ गया कोई
लेकर नया वो इक बदन या मेरे खुदा. “

देवी है दरिया आग का दिल में मेरे रवां
महसूस कर रही हूँ जलन या मेरे खुदा.”

बस इस अहसास भरे शब्दों के गुलदस्ते ने अपनी महक को मेरे अंतर्मन को निशब्द कर दिया है. बाकी बातें मौन में होती रहेंगी. एक बार विजय जी को इस अनोखे, अद्भुत अनुभूति काव्य संकलन को प्रस्तुत करने के लिए मुबारकबाद है.

देवी नागरानी
न्यू जर्सी, यू एस एक
१० , अक्टूबर २००७
dnangrani@gmail.com
URL://charagedil.wordpress.com

सितम्बर 28, 2007

“आओ हिंदी सीखें”

Filed under: समीक्षा — Devi Nangrani @ 11:41 अपराह्न

संपादकः श्रीमती सारिता मेहता

ब फिज़ाओं में महक रही है हिंदी भाषा

विश्व का मँच मिला हिंदी का
घर घर में अब हिंदी बोलो।
रात की रानी जैसे महकी
हिंदी भाषा फिज़ा में घोलो।। देवी नागरानी

बाल साहित्य के “आओ हिंदी सीखें”

गत में “आओ हिंदी सीखें”जी का पहला पर पुख़्तगी से रखा गया कदम है। नाम से, अर्थ और उदेश्य दोनों स्पष्ट नज़र आ रहे हैं। भाषा एक अदभुत रचना है, जो मनुष्य द्वारा रची भी जाती है और उसे रचती भी है। “हिंदी भाषा नहीं है, एक प्रतीक है, भारत की पहचान है, हिंदी को बढ़ावा मिल रहा है, यह हिंदुस्तानियों की मेहनत है। अनेक भाषाओं के आदान प्रदान से हमारी संस्कृति पहचानी जाती है। किसी भी भाषा का साहित्य उस भाषा का वैभव है, उस भाषा का सौंदर्य है। हर देश की तरक्की उसकी भाषा की तरक्की से जुड़ी होती है। हिंदी केवल भाषा नहीं, एक सौंदर्य है, बहती गंगा है, मधुर वाणी है।

मानव मन की वाणी हिंदी
आदि वेद की वाणी हिंदी।

सामान्य साहित्य हो या बाल साहित्य हो, दोंनों का उदेश्य और प्रयोजन समान है। बच्चों का एक स्वतंत्र व्यक्तित्व होता है, उनकी रुचि और मनोवृति को ध्यान में रखकर लिखा गया साहित्य ही बाल साहित्य कह जा सकता है। एक ऐसा साहित्य जो उन में बोये हुए अंकुरों को पुष्ट करता है और उन्हें अपनी छोटी समझ बूझ के आधार पर जीवन पथ पर आती जाती हर क्रिया को पहचानने में मदद करता है, साथ साथ उन्हें यह भी ज्ञान हासिल होता है कि वे अपनी संस्कृति को अपने अन्दर विकसित कर पायें।
बाल साहित्य के शिरोमणि श्री बालशौर रेड्डी ने माल ज्ञान विज्ञान पर बातों के दौरान अपनी प्रतिक्रिया में संक्षेप में बताते हुए कहा “बाल साहित्य के सूत्रों से आपका कहने सुनने का नाता है, था और चलता रहेगा। टिमटिमाते सितारे, पानी में मछली, जिज्ञासा भरे प्रश्न उत्पन करती है, प्रश्न उत्तर की चाहत रखता है, बस बाल मन समझने की जरूरत है, चिंतन मनन के पश्चात उसको पाचन करने का समय देना हमारा कर्तव्य है।
हिंदी बाल साहित्य के लेखक का यह कर्तव्य बनता है कि बाल साहित्य के माध्यम से बच्चों की सोच को सकारात्मक रूप देने का प्रयास भी करें। साहित्य को रुचिकर बनायें, विविध क्षेत्रों की जानकारी अत्यंत सरल तथा सहज भाषा में उनके लिये प्रस्तुत करें जिससे बालक की चाह बनी रहे और उनमें जिज्ञासा भी उत्पन होती रहे। इससे उनमें संवेदनशीलता और मानवीय संबंधों में मधुरता बढ़ेगी।
जुलाई में न्यूयार्क में ८वें विश्व हिंदी सम्मेलन के दौरान बाल साहित्य पर काफ़ी विस्तार से चर्चा हुई और बहुत ही अच्छे मुद्दे सामने आए जिनका उल्लेख यहाँ करना ज़रूरी है। डॉ. सुशीला गुप्ता ने बच्चों के मनोविज्ञान की ओर इशारा करते हुए कहा कि बच्चों का मन मस्तिष्क साफ स्वच्छ दिवार होता है जिस पर कुछ भी बड़ी सरलता से उकेरा जा सकता है। इसलिये बच्चों में बचपन से ये शब्द बीज बो देने चाहिये। इसी सिलसिले में दिल्ली के इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविध्यालय की डॉ. स्मिता चतुर्वेदी ने बाल साहित्य के स्वरूप और दिशाओं पर रौशनी डालते हुए यही कहा – “साहित्य बालकों की अपनी विशिष्ट छोटी छोटी समस्याओं को उभारे, उन्हें गुदगुगदाएँ, उनका मनोरंजन करें, और उनकी समस्याओं का आदर्श से हट कर समाधान दे, वही साहित्य श्रेष्ठ बाल साहित्य है।”

भाषा शिक्षण के अपने अनुभवों से परिचित कराते हुए सुश्री सुषम बेदी कहती है, “भाषा पढ़ाना एक कला है और विज्ञान भी। कला इसलिये कि उसमें लगातार सृजनात्मकता की जरूरत है और विज्ञान इसलिये कि उसमें व्यवस्था और नियमों का पूरा पूरा ध्यान रखना पड़ता है। ऊर्जा, उत्साह, सृजनात्मकता और उपज जहाँ भाषा शिक्षण को एक कला का रूप प्रदान करते हैं, वहीं पाठक-पद्धतियों का सही इस्तेमाल विज्ञान का। दोनों का संतुलन ही श्रेष्ठ भाषा शिक्षण की नींव है।”
बच्चे का मानसी विकास ही कुछ ऐसा है, वह आज़ादी का कायल रहता है, बंधन मुक्त। अगर कोई उनसे कहे कि यह आग है, जला देती है, तो उसका मन विद्रोही होकर उस तपिश को जानने, पहचानने की कोशिश में खुद को कभी कभी हानि भी पहुँचा बैठता है। सवालों का ताँता रहता है- क्यों हुआ? कैसे हुआ? और अपनी बुद्धि अनुसार काल्पनिक आकृतियाँ खींचता है और अपनी सोच से भी अनेक जाल बुनता रहता है। मसले का हल अपनी नज़र से आप खोजता है यही उसका ज्ञान है और यही उसका मनोविज्ञान भी। उनके मानसिक व बौद्धिक विकास को ध्यान में रखकर रचा गया साहित्य उनके आने वाले विकसित भविष्य को नज़र में रख कर लिखा जाये तो वह इस पीढ़ी की उस पीढ़ी को दी गई एक अनमोल देन होगी या विरासत कह लें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं।

सरिता जी की मुकम्मिल कोशिश के रूप में उनका पहला कदम “आओ हिंदी सीखें” हमारे सामने इन सभी समस्याओं का समाधान बनकर आया है। प्रवासी भारतीय बच्चे में हिंदी के इस बाल साहित्य के माध्यम से भारतीय इतिहास, संस्कृति, साहित्य से जुड़े रहेंगे। साहित्य सामग्री रुचिकर हो तो बाल मन सहज ही उसकी ओर आकर्षित होता है, जैसे रंग बिरंगी तस्वीरें के आधार से शब्दार्थ को सरलता से समझ पाने कि क्षमता बढ़ जाती है, जिसका प्रयास भी इस पुस्तक में खूब दिखाई देता है। यह पुस्तक बहु-भाषी, बहु-संस्कारी, नये सीखने वाले देश और विदेश के बच्चों को देवनागरी और रोमन दोनों ही लिपियों में पढ़ने और समझने में मददगार सिद्ध होगी। इसमें सरल कविता द्वारा स्वर व व्यंजन को मिसाल साहित पेश किया है जिसे शुरूआती सीखने वाले शागिर्द बड़ी आसानी से याद कर सकते हैं। यहाँ सरिताजी ने बच्चों की मानसिकता को परख कर उसे रोचक ढंग से नवनीतम रूप में प्रस्तुत करने का सफल प्रयास किया है, जिससे उनकी निष्ठा, रचनात्मकता और रोचक बनाकर प्रस्तुत किया है जिसके लिये मैं उन्हें मुबारकबाद देती हूँ।

बस आवश्यकता है उस पुल की जो बाल साहित्य को बच्चों तक पहुँचा पाए। पाठ्य सामग्री हो तो फिर ज़रूरत रहती है वह अमानत बालकों तक पहुँचाने तक की, जो उत्तरदायित्व का काम है। बाल जन्म दिवस पर, शिक्षक दिवस हो या कोई तीज त्यौहार या राष्ट्र दिवस हो, बच्चों को खिलौने, मिठाई या कपड़े लेकर देने से बेहतर है उन्हें बाल साहित्य ही भेंट में दिया जाय, जिससे उन में चाह के अँकुर खिलने लगेंगे और वे अधीरता से हर बार साहित्य की उपेक्षा की बजाय स्वागत करेंगे, अपेक्षा रखेंगें। पर उस मुकाम को हासिल करने का जो भाषा का यज्ञ है उसकी बड़ी ज़िम्मेदारी हम पर, आप पर, और इस पीढ़ी के नौजवान कंधों पर भी है। सवाल यह फिर भी मन में उठता है कि विरासत में हम अपने बच्चों को वह भाषा “हिंदी”, जिसके लिये हम तकरीरें करते हैं, दलीलें देते है, इकट्ठे होकर भीड़ का हिस्सा बनते हैं, वो अमानत उन्हें दे पाते है या नहीं। अगर हमारी युवा पीढ़ी और आने वाली पीढ़ियाँ इसे अपनाने में, संपर्क की भाषा बनाने में नाकामयाब होती है तो दोष हमारा है, देश की भाषा देश में मज़बूत रहेगी तो तब जाकर वह विदेश में पनप पायेगी, और तब ही मातृभाषा से राष्ट्र भाषा बनेगी। देश की भाषा विदेश तक पहुँचे, यह हमारी परीक्षा है, कहाँ तक हम निभा पाते हैं, कितना सींच पाते है इसे अपना व्यहवार से, दुलार से ताकि इसकी जड़ों में पुख्तगी आ सके, और यह लोरी बनकर देश, प्रवासी देश के घर घर में जहाँ एक हिंदुस्तानी का दिल धड़कता है, वहाँ गूँज बन कर फिज़ाओं में फैलती रहे, जिसका विस्तार आकाश की बुलंदियों से ऊँचा हो। जय हिंद। जय हिंदी !!!

Adapted by Devi Nangrani

http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/D/DeviNangrani/ab_fizaaon_mein_mahak_Sameeksha.htm

सितम्बर 27, 2007

“वसीयत” के रचनाकार

Filed under: समीक्षा — Devi Nangrani @ 10:41 अपराह्न

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“वसीयत” के रचनाकार का छोटा सा परिचय

श्री महावीर शर्मा लंडन के निवासी, एक सुलझे हुए कहानीकार और गज़ल गो शायर भी है. परदेस हो या देश एक हिंदुस्तानी ह्रदय हर द्रष्टिकोण से अपने देश की सभ्यता और वहाँ की संस्क्रुति अपने आस पास के पात्रों में ढूँढता रहता है. शायद कहीं न कहीं उसे अपना वजूद बिखरता नज़र आता है जिसका सिमटाव करने की कोशिश यह कहानी एक आईना बनकर सामने पेश आई है. साहित्य की सैर को निकलें तो उनकी साईट पर ज़रूर अपना पड़ाव बनाएं.

कहानीः “वसीयत”

महावीर शर्मा द्वारा लिखी गई यह कहानी दिलों का हक़ीकी दस्तावेज़ है. एक चलते फिरते टाइमज़ोन में ज़िंदगी के माइनों के बदलते रंग का ज़ाइका हक़ीकत का जामा पहन कर सामने आया है.

“चलती चक्की देककर दिया कबीरा रोइ
दो पाटन के बीच में साबित बचा न कोइ.”

ज़िंदगी और मौत का फासला दर गुज़र करते करते, रिश्तों की बाज़ार से गुज़रना पड़ता है. यह एक आम इन्सान की ज़िंदगी का हिस्सा है जो एक कड़वे अहसास का ज़हरीला घूँट पीने के बाद ही तजुरबा बन जाता है. आजकल ये एक आम चलन हो रहा है, शायद मशिनों के दौर में रहते रहते इन्सान की सोच भी मशीनी पुरज़ों की तरह चलती रहती है, अपना काम करती रहती है , बिना यह जाने, बिना यह देखे कि उन पाटों के बीच कौन आया, कौन ज़ख्मी हुआ, कौन कराह उठा. इस शोर के दौर में चीख़ का कानों तक पहुंच पाना तो नामुमकिन है, जहाँ बहरों की बस्तियाँ गूँगों की भाषा अब भी समझने के प्रयास में लगी हुई हैं. देखा और समझा जाए तो यह बात आईना बन कर सामने आती है कि कोई भी बुज़ुर्ग पैदा नहीं होता. ‘आज का बालक कल का पिता’ यही चलन है और रहेगा भी. बस सोच की रफ़्तार ताल मेल नहीं रख पाती और वही टाइमज़ोन का जेनिरेशन गैप बन जाता है.

खा़मुशी को ही झेलिये साहब
मुँह से कुछ भी न बोलिये साहब. देवी

गुफ़्तगू की तरह ख़ामोशियाँ भी बोलती हैं, चीख़ती है पर बेसदा सी उनकी वो आवाज़ें घुटन बन कर दफ़्न हो जाती हैं उन दिलों की धड़कनों में, जहाँ साँसें अहसास बनकर धड़कती हैं. ख़ामुशी की घुटन का घेराव जहाँ घना हो जाता है, वहाँ उसे तोड़ कर एक ज़िंदा लाश को जीवन दान देना एक नेक कदम होता है. पल दो पल उस बुढ़ापे को सहारा देना, उसके पास बैठकर उस के मन की भावनाओं को टटोलना, या उन्हें कुरेदने की बजाय सहलाना किसी तीर्थ पर जाने से ज़्यादा माइने रखता है क्योंकि “पत्थरों में ख़ुदा बसा है” कहना और उस सत्य का दर्शन करना अलग अलग दिशाओं का प्रतीक है, धड़कते दिल में रब बसता है यह एक जाना माना सच है. पर सच से आँखें चुराना, कतराकर पास से होकर गुज़र जाना कितना आसान हो गया है. हाँ जब सच का सामना होता है तो ज़्यादा कुछ नहीं बदलता, इतिहास गवाह है हर बात दोहराई जाती है, सिर्फ नाम बदलते हैं, रिश्तों के माइने बदलते हैं, हालात वही के वही रहते हैं. शब्दों से टपकती हुई पीडा़ का अहसास देखें उनके ह्रदय की गहराइयों को टटोलें, पात्रों की विवशता, एकाकीपन के सूत्र में बंधती जा रही है.

‘एक रात जब मूसलाधार वर्षा हो रही थी। ऐथल के ऐसा तेज़ दर्द हुआ जो उस के लिए सहना कठिन था। मैंने एम्बुलैंस मंगाई और ऐथल की करहाटों व अपनी घबराहट के साथ अस्पताल पहुँच गया।
एक अनंत पीड़ा को जिन सजीव शब्दों में महावीर शर्मा ने पिरोया है लगता है जैसे यह सिर्फ कहानी के पात्रों की बात नहीं चल रही है, उन्होंने खुद इस दौर को जिया है. मेरी गज़ल का एक शेर इसी बात का जामिन हैः
ज़िंदगी को न मैं तो जी पाई
उसने ही मुझको है जिया जैसे.

” मैं जानता था …क्योंकि कोई सुनने वाला नहीं है, उस के अचेतन मन में पड़ी हुई पुरानी यादें चेतने पर आने के लिये जाने कब से सँघर्ष कर रही होगी, किंतु किसके पास इस बूढ़े की दास्तान सुनने के लिये समय नहीं है.” ( पढ़िये कहानी “वसीयत”) http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/M/MahavirSharma/vasiyat_kahani.htm)

http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/D/DeviNangrani/vseeysy_sameeksha.htm

मन का हर ज़र्रा इस सत्य को किसी भी तरह नकार नहीं पाता, पर हाँ, कड़वी दवा का घूँट समझकर सिर्फ निगलने की कोशिश कर सकता है. काल चक्र तो बिना आहट, बिना किसी को सूचित किये, स्वारंथ अस्वार्थ के दायरे के बाहर, दुख सुख की परंपरा को टोड़ता हुआ आगे बढता रहता है और ज़िंदगी के सफर में कहीं न कहीं कोई वक़्त जरूर दोहराया जाता है जहाँ तन्हाई का आलम इन्सान को घेर लेता है, जहाँ वह मकानों की भाँय भाँय करती दीवारों से पगलों की तरह बात करना उस आदमी की बेबसी बन जाती है. दुःख सुख का अहसास वहाँ कम होता है जहाँ उसको बाँटा जाता है, वर्ना उस कोहरे से बाहर निकलना बहुत मुशकिल हो जाता है. ऐसे हालात में बेबसी का सहारा बन जाते है आँसू. आँसुओं का भार जितना ज़्यादा दर्द उतना गहरा…….!! कहानी मन को छूकर उसके मर्म से पहचान करा जाती है जब याद की वादियों से तन्हा गुज़रना पड़ता है. एक वारदात दूसरी के साथ जुड़ती हुई सामने आ जा रही है.

“उस दिन मुझे माँ और ऐथल की बड़ी याद आई। मेरी आँख भर आई! पोते का नाम जॉर्ज वारन रखा.”
कहानी का बहाव मन की रवानी के साथ ऊँचाइयों से बहता हुआ मानव ह्रदय की सतह में आकर थम जाता है. लावा बनकर बह रहा है पिघलता हुआ दर्द, जिसकी पीड़ा का इज़हार कितनी सुंदरता से किया है महावीर जी ने अपने पीड़ित मन के शब्द सुरा से “हंसते खेलते एक साल बीत गया, इतनी कशमकश भरे जीवन में अब आयु ने भी शरीर से खिलवाड़ करना शुरू कर दिया था.”

इस कहानी की तार में पिरोया गया हर एहसास निराला है, बखूबी अहसासों का इज़हार शब्दों में दर्शाया है. “वसीयत” का एक पहलू बड़े ही निराले मोड़ पर आ खड़ा है जहां “विलामा” नामक उस सफेद बिल्ली का जि़क्र आया है. इन्सान और जानवर के संतुलन का संगम, क्रत्घनता और क्रत्घय्ता का एक सँगम महावीर शर्मा जी के शब्दों में…!!
” मैं उसे कहानी सुनाता और वह म्याऊँ म्याऊँ की भाषा में हर बात का उत्तर देती, मुझे ऐसा लगता जैसे मैं नन्हें जार्ज से बात कर रहा हूँ” (जार्ज इस कहानी के पात्र के रूप में उनका पोता है ) मर्म का क्षितिज देकिये..!

‘एक दिन वह जब बाहर गई और रात को वापस नहीं लौटी तो मैं बहुत रोया, ठीक उसी तरह जैसे जॉर्ज, विलियम और जैनी को छोड़ने के बाद दिल की पीड़ा को मिटाने के लिए रोया था। मैं रात भर विलमा की राह देखता रहा। अगले दिन वह वापस आ गई। बस, यही अंतर था विलमा और विलियम में जो वापस नहीं लौटा।
अभिलाषा अंतरमन के कलम की ज़ुबानी अश्कों की कहानी सुना रही है. अपने बच्चों की आस, प्यास बनकर रूह की ज़ुबान से टपक रही है. लपकते शोले मोम को पिघलाने के बजाय दिल को पत्थर भी बना देते हैं. दिल के नाज़ुक जज़्बे बर्फ की तरह सर्द भी पड़ जाते हैं. यह बखूबी दर्शाया गया है इस कहानी में.. धन राषि को धूल की तरह तोल कर लुटाया गया, जिससे न किसी के वक्त का मोल चुकाया जा सकता है, और ना ही किसी के अरमानों को आश्रय देने की कीमत. हाँ आँका गया मूल्य तो उस एक अनकहे लफ़्ज़ का था, उस अनसुने शब्द का था जो कहीं न कहीं अंदर ही घुटकर दफन हो गया था, पर स्नेह के थपथपाहट से कुछ पल धड़क कर जी उठा.
जीवन की सार्थकता जब सिसकती है तो दिल की आह एक वसीयत बन जाती है. बस वसीयत ही रह जाती है. वसीयत के अर्थ की विशालता शायद इन्सानी समझ समझने में असमर्थ है. जो आँखें देखती है, धन, दौलत, घर परिवार, ईंट गारे से बने महल जो न जाने किस खोखली बुनियाद पर बने है, जहाँ इन्सान नाकाम हो जाता है अपनी आने वाली अवस्था को देखने में, टटोलने में, जिसे वह आज सहला रहा है, सजा रहा है. आज जब कल का रूप धारण करेगा तब इतिहास दोहराया जायेगा. जहाँ वसीयत करने वाला लाचारी की शिला पर खड़ा है, उसी राह का पथिक हर एक को बनना है, उस बनवास के दौर से गुज़रना है तन्हा तन्हा.
अपना भविष्य उज्वल रखने वालों की चाह को सार्थक बनने और बनाने का बस एक यही साधन है कि आज का आदम कुछ पल अपनी इस मशीनी जिंदगी से निकाल कर खुद अपने परिवार के एक भी एकाकी सदस्य के मन में एक सखा भाव से झाँक कर देखे और उसे यह अहसास दिलाये कि वह अकेला नहीं है. वह तो एक भरपूर पुख़्ते परिवार का सहारा व स्थंभ है, जो शासक होते हुए बहुत कुछ दे तो सकता है पर कुछ भी ले नहीं सकता, सिवाय कुछ क्षणों के जिनकी कीमत वह वसीयत के रूप में चुका सकता है. हाँ चुका सकता है.

सितम्बर 15, 2007

“प्रवासिनी के बोल”

Filed under: Articles-English, समीक्षा — Devi Nangrani @ 3:16 अपराह्न

सँपादकः डॉ॰ अँजना सँधीर

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प्रिय अँजना,

महिलाओं का तू चितवन है
सुंदर और सलोना मधुबन है
तेरी सोच व शीरीं बातें
कितना उनमें अपनापन है
स्नेह स्वरूप ये “बोल” मिले
तेरे श्रम का ये दरपन है.

देवी नागरानी

डॉ॰ अंजना संधीर ने एक अनोखी विचार धारा को इस सँग्रह के रूप में साकार करके अनूप और अनोखा स्वरूप दिया है और एक सूत्र में पिरोकर प्रस्तुत किया है, लग रहा है जैसे नारी जाति के सन्मान में एक नया मयूर पँख लगा है. उनका दृढ़ सँकल्प ही इस काव्य सँग्रह “प्रवासिनी के बोल” के रूप में प्रकाशित हो पाया है.

“ख़्याल उसका हरेक लम्हा मन में रहता है
वो शम्मा बन के मेरी अंजुमन में रहता है
मैं तेरे पास हूं, परदेस में हूं, खुश भी हूं
मगर ख़्याल तो हर दम वतन में रहता है.” अँजना

अंजना जी के इस कथन में एक निचोड़ है, एक अनबुझी प्यास का अहसास जो सीने में कहीं न कहीं पनपता तो रहता है पर खिल नहीं पाता, खिलता है तो महक नहीं पाता, उस अनजान तड़प को उन्होंने शब्द दिये है “प्रवासिनी के बोल”. भरी आंखों और तड़पती हृदय वेदना परदेस में रहने वालों की, उनकी कलम की नोक से पीड़ा स्वरूप बहती सरिता बन कर सामने आई है. मुझे अपनी एक गज़ल के चंद शेर याद आ रहे हैः

इल्म अपना हुआ तो जान गई
मैं ही कुर्आन, मैं ही गीता हूँ.
है अयोध्या बसा मेरे मन में
वो तो है राम, मैं तो सीता हूं.
दर्द साँझा जो सबका है देवी
मैं उसी दर्द की कविता हूं.

अपने देश और संस्कृति से कट कर प्रवासी जीवन में जो उपलब्धि और विघटन होता है, उसे नारी ह्रदय महसूस करता है और भावनायें कलम का सहारा पाने से नहीं चूकती. जाने अनजाने में वो पद चिन्ह बनकर कहीं न कहीं अपनी छाप जरूर छोड़ जाती हैं, जो कभी न कभी साकार स्वरूप अख़त्यार कर लेती हैं.
एक फिलासफ़र शल्फ वाल्डो एमरसन के शब्दों में ” सीधा सीधा रास्ता पकड़कर न चलो, वहां चलो जहां कोई रास्ता या सड़क न हो. चलो और अपने पीछे एक पगडंडी छोड़ जाओ. ” इस विचार धारा को अंजना जी ने स्वरूपी जामा पहनाने का प्रयास किया है अपने श्रम परिश्रम के बलबूते पर, और साहित्य साधना की इस नई पगडंडी पर नारी जाति के मनोबल व सामर्थ्य को एक मुकाम पर लाने का बखूबी प्रयास किया है.

सारा आकाश नाप लेती है
कितनी ऊंची उड़ान है तेरी. देवी

जो स्वप्न अभी तक आंखों में तैरता रहा, उसकी नींव इस किताब के रूप में रक्खी है. देश से बाहर परदेस में, भाषा के विरोधी वातावरण में, अपनी हिंदी भाषा को कविता के माध्यम से जिंदा रखना अनुकूल क्रिया है. भाषा को ज़िंदा रखना हमारा कर्तव्य है, क्योंकि यह हमारे पास, आने वाली पीढ़ियों की धरोहर है . भाषा ज़िंदा है तो हम भी जिंदा रहेंगे. स्त्री मन को जागृत करके उसके मनोबल को पहचान देना एक साहस पूर्ण प्रयास ही नहीं, एक काबिले तारीफ कदम है, जो इतिहास के पन्नों पर उल्लेखनीय बन जाता है, और तो और भारत व अमरीकी हिंदी रचनाकारों के बीच एक सेतू बाँधने का श्रेय भी अंजना जी को जाता है.
इसी प्रयास को अँजनाजी ने एक बागबान की तरह दिन रात की मेहनत से सींचकर एक महकते हुए मधुबन का स्वरूप देकर अमरिका के नारी पक्ष को उजागर किया है. यहां पर वाली आसी साहब का शेर इस बात का सँपूर्ण गवाह हैः

हमने एक शाम चरागों से सजा रक्खी है
शर्त लोगों ने हवाओं से लगा रक्खी है
हम भी अंजाम की परवाह नहीं करते यारों
जान हमने भी हथेली पे उठा रक्खी है.

उसी साहस और शालीनता का उदाहरण एक परिपूर्ण ग्रंथ (An anthology connecting the East & the West) के रूप में “प्रवासिनी के बोल” कुल मिलाकर ६२२ पन्नों के रूप में मनोभावों से भरपूर आपके सामने आया है, जिसमें यू़.एस.ए में रहने वाली ८१ अमरीकी भारतीय हिंदी कवयित्रियों की ३२४ कविताएं पहले भाग में दी गई हैं, हिंदी से जुड़ी ३३ प्रतिभाशाली महिलाओं का सचित्र परिचय दूसरे भाग में दर्शाया गया है, तथा तीसरे भाग में अमरीका में अब तक प्रकाशित महिला साहित्यकारों की प्रकाशित पुस्तकों की यादि भी शामिल है. विदेश में रचा जा रहा साहित्य ही इस बात का प्रमाण है कि हम अपने देश से दूर जरूर है, पर देश हमसे दूर नहीं. दिल्ली से राजी सेठ का कथन है ” भाषा के घेरे से परे रहकर अपनी भाषा की, देश से परे रहकर देश की, परिवेश से परे रहकर देश के रँग- रूप, तीज-त्यौहार, मिथिक -इतिहास को रचने की प्रेरणा इन्हें कौन देता होगा?” उनके उत्तर में मेरी ये दो पँक्तियाँ हर नारी के ह्रदय की पुकार है, ललकार है.

दिल में देश बसाकर रक्खा हमनें
धड़कन बनकर खुद हम बसते उसमें. देवी

हमारा घर, उसका वातावरण, दिन चर्या में हमारा चलन, आपसी व्यहवार, हमारी भाषा और संस्कृति को बरक़रार रखने के लिये हिंदी भाषा का अनुकूल उपयोग एक योगदान है. साहित्य के वरदान को अलग – अलग अनुभूतियों को भिन्न-भिन्न स्वरूप में से सजाकर इस सँकलन में पिरोया गया है, जिनमें नारी हृदय के वात्सल्य के साथ करुणा, दया, प्रेम, सेवा के भाव लिये हुए अनेक मधुर ग़ज़ल, गीत, लोक गीत, कवितायें, तीज त्यौहार पर अपनी भावनाएं, अपने कोमल ह्रदय के ताने -बाने बुनते-बुनते कभी इन्हीं अहसासों को शब्दों का जामा पहना कर बड़ी सुंदरता से प्रस्तुत किया है नारी के तस्वुर को “वसुधा” के प्रकाशक व सम्पादक श्रीमती स्नेह ठाकुर ने बड़ी खूबी के साथ प्रस्तुत किया है, पः ६७
नारी
अशक हूं
वक्त की पलकों पर टिकी हूं
लहर हूं
सागर की बाहों में थमी हूं
शबनम हूं
ज़मीं के आगोश में बसी हूं
चिंगारी हूं
शोला बन कर भड़की हूं
किरण हूं
सूरज में समाई हूं
लता हूं
तन के सहारे बढ़ी हूं
नदी हूं
कगार के बँधन में बँधी हूं
फूल हूं
काँटों से उलझी हूं
कोमल हूं
रुई के फाहों से सहेजी जाती हूं
धरती हूं
अंबर के चँदोबे तले फली फूली हूं
अबला हूं
पुरुष की संरक्षता में रहती हूं
नारी हूं
पुरुष व पुरुषार्थ की जन्मदात्री हूं.

नारी मन आकाश से ऊँच्चा व पाताल से गहरा होता है यही सत्य है, क्योंकि नारी जन्मदात्री है, हर हाल में अपना आपा बनाये रखती है कारण कुछ भी हो. मेरी एक कविता “प्रदर्शन” का एक चित्र कुछ इसी तरह का है. पः २०३

दरिद्रता को ढाँपे
अपने तन के हर पोर में
वह नारी फिर भी,
कर रही है
प्रदर्शन अपना,
उन भूखी आँखों के सामने
जो आर पार होकर
छेद जाती है निरंतर
पर देख नहीं पाती
उस नारी का स्वरूप
जो एक जन्मदाता है
जीवन को बनाये रखती है
उसको सजाने के लिये
बलि तो दे सकती है
पर, ले नहीं सकती.

और सच तो यही है, एक कण कविता का एक युग को ज़ायकेदार बना सकता है, और भाव प्रकट करने का एक निर्मल माध्यम बन जाता. आनेवाली कई पीढियों तक औरत जाति के नाम के साथ अंजना जी का नाम भी जुड़ा रहेगा. इल्म का दान उत्तम दान है, इसके द्वारा विकास व प्रगति के कई नये रास्ते खुल जाते हैं, इस युग में वतन की मिट्टी से दूर निवास करने वाली भारत के हर कोने में बसने वाली नारी, जो विदेश में आ बसी है, इस “प्रवासिनी के बोल” में अपनी कलम की जुबानी अपने मन के भावों को, अपने अँदर पनपते अहसासों को जुबाँ दे पाई है. पर अंजना जी ने इन्हें एक सूत्र में बाँध कर एक महिला संगठन को एक नई रौशनी की नींव पर खड़ा किया है. इस आशावादी सँकल्प के बल पर प्रवासी कवयित्रियों की रचनाओं में, उनकी देश से दूर रहने की वेदना, कुछ अमरीका की खट्टी -मीठी अनुभूतियाँ, मन में उठती हर भावपूर्ण लहर को खुले मन से कविता द्वारा प्रकट करने के लिये यह क्रियाशील प्रयास किया है.
फिलास्फर इलेन लाइनर का कहना हैः ” अगर लेखक ये न लिखते कि उन्हें क्या महसूस हुआ तो बहुत सारे कागज़ ख़ाली होते”. इसी सच को यदि सामने रखा जाय तो देखने को मिलेगा, उन कवित्रियों के मन का मँथन, उनके अंदर की कोमलता, द्रढ़ता, वेदना, सँघर्ष, दुख, सुख, यादों की परछाइयां, मजबूरियाँ, तन्हाइयों के साथ बातें करने का अनुभव, देश के प्रति उमड़ते उनके ज़ज़बे जिनको इसी किताब से चुनकर मैंने यहां प्रस्तुत किया हैं. अँतरमन की वेदना कुसुम टँडन ने “बनवास” नामक कविता से छलकती हुई, पः १६५

रच गया एक इतिहास नया
फिर से इस नये ज़माने में
दे दिया है बनवास राम ने
माता पिता को अनजाने में.
॰॰
मेरी एक कविता “यादों का आकाश” यादों की दीवारों को खरोंच रहा है

मेरी यादों के आकाश के नीचे
दबी हुई है
मेरे ज़मीर की धरती,
थक चुकी है जो
बोझ उठाकर
अपने जे़हन के आँचल पर
झीनी चुनरिया जिसकी
तार तार हुई है
उन दरिंदों के शिकँजों से
उन खूँखार नुकीली नजरों से, जो
शराफत का दावा तो करते हैं
पर,
दुशवारियों को खरीदने का
सामान भी रखते हैं
बिक रहा है ज़मीर यहां
रिश्तों के बाजार में
बस बची है अंगारों के नीचे
दबी हुई कुछ राख
मेरे जिँदा जज्बों की
जो धाँय धाँय उड़कर
काला स्याह करती जा रही है
मेरे यादों के आकाश को.
॰॰
डॉ. प्रियदर्शिनी का अनुभव जिंदगी के बारे में उनकी ज़ुबानी, पः ३५
ज़िंदगी
नदी पर बना हुआ
लकड़ी का वह अस्थाई पुल है,
जिस पर हम
डगमगाते – डोलते
हिलोरें खाते
भयभीत
नीचे खाई में न झाँकने का प्रयास करते,
उस पार पहुँचने की ललक किये
चलते जाते हैं.
॰॰
बीना टोडी “मेरा अस्तित्व” में मन को टटोल रही है, पः३१२
करता है प्रशन अचानक मेरा मन
साये से क्या वजूद है मेरा
या है अस्तित्व साये का मुझसे?
॰॰
अँजना सँधीर के अपने अहसास कुछ यादों की परछाई बने हैं, पः ८४
चलो
एक बार फिर लिखें
खुशबू से भरे भीगे खत
जिन्हें पढ़ते पढ़ते भीग जाते हैं हम
इन्तज़ार करते थे डाकिये का हम
बँद करके दरवाज़ा
पढ़ते थे चुपके चुपके
वे भीगे ख़त तकिये पर सर रखकर.
॰॰
“फिर गा उठी प्रवासी” की रचनाकार लावन्य शाह, का कोमल मन झूमता हुआ. पः ४१५
पल पल जीवन बीता जाए
निर्मित मन के रे उपवन में
कोई कोयल गाये रे!
सुख के दुख के, पंख लगाये
कोई कोयल गाये रे!
॰॰
सारिका सक्सेना की कल्पना इँद्रधनुषी रूप धारण करती हुई उड़ रही है, पः४६०
तितली बन मन पँख पसारे
बिखरे रँग घनक के सारे.
शोख हवा से लेकर खुशबू
लिख दी पाती नाम तुम्हारे.
॰॰
मेरी अपनी एक आजाद कविता “सियासत” का अँग देश के जवानों को ललकार कर खून की लाली को चुनौती
दे रहा है कुछ इस तरहः
ऐ जवानो ! तुम बचालो
बरबादी के इस अणू से
आबादियों को आतिशों से
उठ के आगे तुम बढो, करलो
सामना तूफान का
करो कुछ काम ऐसा
अमन और शोहरत से मिलो…
॰॰
रजनी भार्गव के कोमल मन के अछूते अहसास “अभिमान” से , पः ३७०
आँगन में किलकती वीरानियां
जब तुलसी के आगे लौ में सुलगती है
कार्तिक की खुनक और लौ की गरमाहट- सा है
ये अभिमान मेरा.
॰॰
इला प्रसाद की जुबानी “यह अमेरिका है” पः १२१
रात भर चमकता रहा जुगनू
रह रह कर
किताबों की अलमारी पर,
हरी रौशनी, जलती रही, बुझती रही
मैं देखती रही, जब भी नींद टूटी
सोचती रही
“कल सुबह पकड़ूंगी
रख लूंगी शीशे के ज़ार में,
जैसे बचपन में रख लेती थी!”

इतने अनोखे अहसास, माध्यम कविता. इस नए सँचार की श्रृंखला शुरू करके अंजना जी ने बहुत ही गौरवपूर्ण उदाहरण कायम किया है. विश्व कवि रवींद्रनाथ का कथन, बरसों बाद भी उसी सच्च को ऐलान कर रहा है. वे कहा करते थे कि शांतिकेतन का रचनाशील विद्यार्थी जहां कहीं भी जायेगा वहां एक छोटा भारत निर्मित करेगा. याद आ रहा है कालिदास का “मेघदूत” जो सालों पहले पढ़ा था, मेघ अर्थात बादल जो दूत बनकर सँदेशा ले कर आते है. अँजनाजी का सफलपूर्ण प्रयास कविता की जुबानी पूरब और पश्चिम के बीच का सेतू बनकर यही सरमाया देगा, और इसी नज़रिये से यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि उन्होंने अमेरिका में एक छोटा भारत निर्मित करने का सफल प्रयास किया है.
कहा जाता है, हासिल की हुई कामयाबी अगर जग को अच्छी लगती है पर अपने मन को नहीं भाती, तो वह अधूरी कामयाबी होती है. पर इस रचना को रचयित करने में योगदान देने वाली हर नारी इस कामयाबी का हिस्सा है, जैसे एक परिपूर्ण परिवार का मिला जुला एक सफल यग्य है ” प्रवासिनि के बोल”. नई दिल्ली से डॉ॰ कमल किशोर गोयनका का कहना है ” इस संकलन का सब से बड़ा कार्य यह है कि इतनी प्रवासी हिंदी कवयित्रियाँ पहली बार हिँदी संसार के सम्मुख आ रही हैं और इतनी प्रकार की अनुभूतियाँ हमें मिल रही हैं. मेरे विचार में यह प्रयास स्तुत्य है, स्वागत के योग्य है.” इसी बात का समर्थन करते हुए मुझे भी ऐसे लगता है, इस किताब पर हर नारी के हर्दय से निकले बोल “प्रवासिनी के बोल” के रूप में जी उठे हैं. इसी संदर्भ में, मैं सारी नारी जाति की तरफ़ से अँजना जी को हार्दिक धन्यवाद देती हूं, और शुक्रगुजार हूँ जो मुझे भी अपने इस क्रियाशील अनुभव में अपने स्नेह के धागे में पिरोकर सन्मानित किया है.
मैं अपनी यह गज़ल जिसमें अँजना जी के इस किताब ने अहसास भरे है उन्हीं को अर्पित करती हूं. वतन की याद दिल में बसी रहे, याद के दिये झिलमिलाते रहें, चाहे हम देश में हों या देश से दूर पर जब तक साँस है आस यही रहेगी और यही रहेगी.

मेरे वतन की खुशबू

बादे-सहर वतन की चँदन सी आ रही है
यादों के पालने में मुझको झुला रही है.

ये जान कर भी अरमां होते नहीं हैं पूरे
पलकों पे ख़्वाब ‘देवी’ फिर भी सजा रही है.

कोई कमी नहीं है हमको मिला है सब कुछ
दूरी मगर वतन से मुझको रुला रही है.

पत्थर का शहर है ये, पत्थर के आदमी भी
बस ख़ामशी ये रिश्ते, सब से निभा रही है.

शादाब मेरे दिल में इक याद है वतन की
तेरी भी याद उसमें, घुलमिल के आ रही है.

‘देवी’ महक है इसमें, मिट्टी की सौंधी सौंधी
मेरे वतन की खुशबू, केसर लुटा रही है.

देवी नागरानी

शुभकामनाओं के साथ

देवी नागरानी

न्यू जर्सी, यू.एस.ए
नवँबर ५, २००६
Email: dnangrani@gmail.com
URL: <http://charagedil.wordpress.com&gt;
अँजना सँधीरः anjana_ sandhir@yahoo.com

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