दिल से दिल तक

फ़रवरी 19, 2010

Glimpses of memory lane

Filed under: Articles-English — Devi Nangrani @ 1:47 अपराह्न

 Vijay  Bhatnagar  — The Eminent Writer.

No gift is greater than the gift of knowledge and at times knowledge is in fact a reflection of the mind. The thoughts woven around the situations and circumferences create a reflective impact on the mind, and at times the transparency of the thoughts is redirected in words. A writer is always very close to his writing and a living replica at times of his conscious and subconscious acts that displays his personality.

            The best sources of knowledge are always nature and also one’s own mistakes. These two factors process you towards self realization. Vijay  Bhatnagar’s  introductory incident about smoking of a cigarette was a happening that helps him explore the depths of truth that links an illusion to reality of life. The solitude that wraps a person always draws one towards its own focal point of silence and in silence you seek, you attain and you cherish. As our philosopher and poet Ravindranath Tagore has truly said “Only a few blessed ones know the absolute truth, others merely live on its interpretation”.  

            Vijay Bhatnagar  has developed just and firm acceptance of reality for being what he is in reflected in his own words  “Sacrifices of parents shape the future of children”.   ‘Glimpses of memory Lane’ as the title of the book beautifully reflects with the vast expanse of known and unknown horizon is in a way an autobiography that has trodden the path of life. Going through testimonials of life one defiantly matures as one lives and overcomes  the moments of struggle, hardship, joy, sorrow, patience and all the possible facts of life  that  give a handy first hand experience to know ones self better and better. Walking through the lane of life,  one leans to be model role through experience. The only supporting source is God that exists in conscience . Truly going through pain and pleasure is a package deal. The  web of relations  is an intricate bifurcation  in various directions.

A Child in the cradle is the father of the nation is a common saying, and simultaneously a chils is also the creator of mankind.  All said and done the major lighthouse of life is marriage which is strong bond that grows, strengthens and sustains the family. As a  base of every relation marriage should  synchronise and try to sustain the multiple responsibilities related to  physical, mental, moral and  spiritual. well-being.

            The richness of life is painted in colours of love when you begin to love and begin to live as quoted by a Philanthropist stands  true to Vijay Bhatnagar – a man of sincere emotional outstanding of firmness.  The emotional balance is the outcome of the best frame work of mind that has borne the struggle, fall, rise and learnt  to sustain self, and that in  itself is a drilled culture, rather than just civilization that is  just superficially impose rather than drilled.  

            The different phases of Vijay’s  life as he has gone through and in the process of reflecting, feels that his thoughts guide him to the smoothest, melodious sanctuary where one disturbs him in that melancholy  canopy with self.  

            Shri. Yogendra says “when I came into the world, the only thing that really belonged to me was my body when I shall have to leave it is not the only thing that must give away to death. “ As man is a spiritual being has much more momentum and potentiality   to reproduce. Life reaps ts own rewards but at the right time and in right place. Man has to have understanding and patience , as for every act the time-frame is already set up.

I extend  my good wishes for giving us the best shared moments of his life and the truth “Give, give and give to have God on your side”                      Devi Nangrani


Poetry-Music of my Heart

Filed under: Articles-English — Devi Nangrani @ 1:43 अपराह्न

Poetry is the music of my Heart

Writing is my passion. Any thing that I see around, feel even smell needs to find expression from the lips of my heart in a spoken language. In a way I talk to myself and reproduce the thoughts through language, may it be Sindhi, Hindi or English. Poetry is the music of my Heart and it is a part of the constitution.  Writing   poetry is like nourishing a garden where we sow seeds of words that sprout when you put manure of efforts and nourish with thoughts, it is only then that the colorful ideas with fragrance come to the surface. In every human there is a dormant poet, an artist, a sculptor some where or the other. When expressing a personal thought, idea or concept, it travels through expression finding words and ultimately the personal feelings are generalized. The speechless thoughts take the support of words to find expression and they grow and mature as the saplings, start whispering and walking. Still the fact remains unchanged that ‘Life’ is poetry but poetry is not life. Words and poet have a co-relative bond. Words may exist without a writer, but a writer cannot exist without words. But poetry in form of words on paper is nothing but the fruit of thoughts that survive in the heart of a poet.

जुलाई 13, 2008

‘महावीर’ ब्लॉग पर मुशायरा

Filed under: Articles-English — Devi Nangrani @ 11:39 पूर्वाह्न


महावीरब्लॉग पर मुशायरा (कवि-सम्मेलन)


वरिष्ठ लेखक, समीक्षक, ग़ज़लकार श्री प्राण शर्मा जी की प्रेरणा से जुलाई १५, २००८ एवं जुलाई २२,२००८ को इस ब्लॉग पर मुशायरे का आयोजन किया जा रहा है।
इस ब्लाग पर मुशायरे में शिरकत के लिए कवियों की बड़ी तादाद होने की वजह से मुशायरे को दो भागों में दिया जा रहा है। पहला भाग १५ जुलाई और दूसरा भाग २२ जुलाई २००८ को दिया जायेगा।

देश-वदेश से शायरों और कवियों में प्राण शर्मा, लावण्या शाह, तेजेन्द्र शर्मा, देवमणि पांडेय, राकेश खण्डेलवाल, सुरेश चन्द्र “शौक़”,कवि कुलवंत सिंह, समीर लाल “समीर”,नीरज गोस्वामी, चाँद शुक्ला “हदियाबादी”,देवी नागरानी, रंजना भाटिया, डॉ. मंजुलता, कंचन चौहान,डॉ. महक, रज़िया अकबरमिर्ज़ा, हेमज्योत्सना “दीप”, नीरज त्रिपाठी आदि पधार रहे हैं।

आप से निवेदन है कि उनकी रचनाओं का रसास्वादन करते हुए ज़ोरदार तालियों (टिप्पणियों) से मुशायरे की शान बढ़ाएं।
महावीर शर्मा
प्राण शर्मा
पत्र-व्यवहार इस ईमेल पर कीजिए :
महावीर‘ – http://mahavir.wordpress.com


जून 17, 2008

कल्पना और भाषा की अद्भुत पकड़

Filed under: Articles-English, समीक्षा — Devi Nangrani @ 4:15 अपराह्न
श्रीमती देवी नागरानी जी के अब तक दो ग़ज़ल संग्रह ग़म में भीगी ख़ुशी और चराग़ेदिल प्रकाशित हो चुके हैं। अपनी संवेदना और भाषा की काव्यात्मकता के कारण देवी जी संवेदनशील रचनाकार कही जा सकती हैं। देवी जी अपने इस नये ग़ज़ल संग्रह में ग़ज़लों को कुछ इस अंदाज़ से कहती हैं कि पाठक पूरी तरह उन में डूब जाता है। विचारों के बिना भाव खोखले दिखाई देते हैं। इस संग्रह में भावों और विचारों का सुंदर सामंजस्य होने के कारण यह पुस्तक सारगर्भित बन गई है।
शाइर ज़िन्दगी की जटिलताओं के बीच अपने संघर्ष का इज़हार करने के लिए एक उपकरण ढूंढता है जो देवी जी की ग़ज़लों में अभिव्यक्त हुई है। देवी जी तकनीकी नज़ाकतों से भी भली भांति परिचित हैं। ज़िन्दगी अक्सर सीधीसादी नहीं हुआ करती। उन्होंने लंबे संघर्षों के बीच अपनी राह बनाई हैः
जिसे लोग कहते हैं जिंदगी
वो तो इतना आसां सफ़र नहीं.

तवील जितना सफ़र ग़ज़ल का
कठिन है मंज़िल का पाना उतना.

नारी से जुड़े हुए गंभीर सवालों को उकेरने और समझाने के लिए उनके पारदर्शी प्रयास से ग़ज़लों के फलक का बहुत विस्तार हो गया है। फिर भी स्त्रीमन की तड़प, चुभन और अपने कष्टों से झूझना, समाज की रुग्ण मानसिकता आदि स्थितियों की परतें खोल कर रख देना तथा अपनी रचनाओं की अंतरानुभूति के साथ पाठकों को बहा ले जाती हैं:

कैसी दीमक लगी है रिश्तों की

रेज़े देवी है भाईचारों के





नारी के जीवन की पीड़ा, संघर्ष और अस्तित्व की पहचान भी कराती हैं:
ये है पहचान एक औरत की

माँ बाहन, बीवी, बेटी या देवी.
ग़ज़ल कहने की अपनी अलग शैली के कारण देवी जी की ग़ज़लों की रंगत कुछ और

ही हो जाती है। अतीत का अटूट हिस्सा हो कर यादों के साथ पहाड़ जैसे वर्तमान
को भी देख सकते हैं:
कुछ न कुछ टूटके जुड़ता है यहाँ तो यारो

हमने टूटे हुए सपनों को बहुत ढोया है


इम्तिहाँ ज़ीस्त ने कितने ही लिए हैं देवी
उन सलीबों को जवानी ने बहुत ढोया है.

उनकी शब्दावली, कल्पना और भाषा की अद्भुत पकड़ देखिएः
मुहब्बत की ईंटें न होती अगरचे
तो रिश्तों की पुख़्ता इमारत न होती.


वो सोच अधूरी कैसे सजे
लफ़्ज़ों का लिबास ओढ़े न कभी.
आज की शाइरी अपने जीवन और वक्त के बीच गुज़रते हुए तरक्की कर रही है। समय की यातना से झूझती है, टकराती है और कभी कभी लाचार हालत में तड़प कर रह जाती हैः
ज़िदगी से जूझना मुशकिल हुआ इस दौर में
ख़ुदकुशी से ख़ुद को लेकिन मैं बचाकर आई हूँ


वक्ते आखिर आ के ठहरे है फरिश्ते मौत के
जो चुराकर जिस्म से ले जायेंगे जाने कहाँ.

उनकी ग़ज़लों के दायरे का फैलाव सुनामी जैसी घटनाओं के समावेश करने में देखा जा सकता है, जिसमें आर्द्रता है, मानवीयता हैः


सुनामी ने सजाई मौत की महफ़िल फ़िज़ाओं में
शिकारी मौत बन कर चुपकेचुपके से कफ़न लाया.
आज धर्म के नाम पर इंसान किस तरह पिस रहा है। धनलोलुपता के कारण धर्म के रक्षक ही भक्षक बन कर धर्म और सत्य को बेच रहे हैं। इस ग़ज़ल के दो मिस्रों को देखिएः

मौलवी पंडित खुदा के नाम पर
ख़ूब करते है तिजारत देखलो


दाव पर ईमान और बोली ज़मीरों पर लगी
सौदेबाज़ी के नगर में बेईमानी दे गया.
निम्नलिखित पंक्तियों में अगर ग़ौर से देखा जाए तो यह आईना उनके अंदर का आईना है या वक्त का या फिर महबूब का जिसके सामने खड़े होकर वो अपने आप को पहचानतीं हैं :
मुझको सँवरता देखके दर्पण

मन ही मन शरमाया होगा.
इन अशा में गूंजती हुई आवाज़ उनकी निजी ज़िन्दगी से जुड़ी हुई है। कितनी ही यातनाएं भुगतनी पड़े, पर वे हार नहीं मानती, बस आगे बढ़ती जाती हैं:
पाँव में मजबूरियों की है पड़ी ज़ंजीर देवी

चाल की रफ़्तार लेकिन हम बढ़ाकर देखते हैं.


हौसलों को न मेरे ललकारो
आँधियों को भी पस्त कर देंगे.
जीवन के लंबे अथक सफ़र पर चलते चलते देवी जी ज्यों ही मुड़ कर अतीत में देखती हैं तो बचपन के वो क्षण ख़ुशी देकर दूर कहीं अलविदा कहते हुए विलीन हो गयाः
वो चुलबुलाहट, वो खिलखिलाहट
वो मेरा बचपन न फिर से लौटा.

आशा है कि देवी नागरानी जी का यह ग़ज़लसंग्रह ग़ज़ल साहित्य में अपना उचित स्थान पायेगा। हार्दिक शुभकामनाओं सहित
महावीर शर्मा

7 Hall Street, London, North Finchley, N12, 8DB. UK

सितम्बर 15, 2007

“प्रवासिनी के बोल”

Filed under: Articles-English, समीक्षा — Devi Nangrani @ 3:16 अपराह्न

सँपादकः डॉ॰ अँजना सँधीर


प्रिय अँजना,

महिलाओं का तू चितवन है
सुंदर और सलोना मधुबन है
तेरी सोच व शीरीं बातें
कितना उनमें अपनापन है
स्नेह स्वरूप ये “बोल” मिले
तेरे श्रम का ये दरपन है.

देवी नागरानी

डॉ॰ अंजना संधीर ने एक अनोखी विचार धारा को इस सँग्रह के रूप में साकार करके अनूप और अनोखा स्वरूप दिया है और एक सूत्र में पिरोकर प्रस्तुत किया है, लग रहा है जैसे नारी जाति के सन्मान में एक नया मयूर पँख लगा है. उनका दृढ़ सँकल्प ही इस काव्य सँग्रह “प्रवासिनी के बोल” के रूप में प्रकाशित हो पाया है.

“ख़्याल उसका हरेक लम्हा मन में रहता है
वो शम्मा बन के मेरी अंजुमन में रहता है
मैं तेरे पास हूं, परदेस में हूं, खुश भी हूं
मगर ख़्याल तो हर दम वतन में रहता है.” अँजना

अंजना जी के इस कथन में एक निचोड़ है, एक अनबुझी प्यास का अहसास जो सीने में कहीं न कहीं पनपता तो रहता है पर खिल नहीं पाता, खिलता है तो महक नहीं पाता, उस अनजान तड़प को उन्होंने शब्द दिये है “प्रवासिनी के बोल”. भरी आंखों और तड़पती हृदय वेदना परदेस में रहने वालों की, उनकी कलम की नोक से पीड़ा स्वरूप बहती सरिता बन कर सामने आई है. मुझे अपनी एक गज़ल के चंद शेर याद आ रहे हैः

इल्म अपना हुआ तो जान गई
मैं ही कुर्आन, मैं ही गीता हूँ.
है अयोध्या बसा मेरे मन में
वो तो है राम, मैं तो सीता हूं.
दर्द साँझा जो सबका है देवी
मैं उसी दर्द की कविता हूं.

अपने देश और संस्कृति से कट कर प्रवासी जीवन में जो उपलब्धि और विघटन होता है, उसे नारी ह्रदय महसूस करता है और भावनायें कलम का सहारा पाने से नहीं चूकती. जाने अनजाने में वो पद चिन्ह बनकर कहीं न कहीं अपनी छाप जरूर छोड़ जाती हैं, जो कभी न कभी साकार स्वरूप अख़त्यार कर लेती हैं.
एक फिलासफ़र शल्फ वाल्डो एमरसन के शब्दों में ” सीधा सीधा रास्ता पकड़कर न चलो, वहां चलो जहां कोई रास्ता या सड़क न हो. चलो और अपने पीछे एक पगडंडी छोड़ जाओ. ” इस विचार धारा को अंजना जी ने स्वरूपी जामा पहनाने का प्रयास किया है अपने श्रम परिश्रम के बलबूते पर, और साहित्य साधना की इस नई पगडंडी पर नारी जाति के मनोबल व सामर्थ्य को एक मुकाम पर लाने का बखूबी प्रयास किया है.

सारा आकाश नाप लेती है
कितनी ऊंची उड़ान है तेरी. देवी

जो स्वप्न अभी तक आंखों में तैरता रहा, उसकी नींव इस किताब के रूप में रक्खी है. देश से बाहर परदेस में, भाषा के विरोधी वातावरण में, अपनी हिंदी भाषा को कविता के माध्यम से जिंदा रखना अनुकूल क्रिया है. भाषा को ज़िंदा रखना हमारा कर्तव्य है, क्योंकि यह हमारे पास, आने वाली पीढ़ियों की धरोहर है . भाषा ज़िंदा है तो हम भी जिंदा रहेंगे. स्त्री मन को जागृत करके उसके मनोबल को पहचान देना एक साहस पूर्ण प्रयास ही नहीं, एक काबिले तारीफ कदम है, जो इतिहास के पन्नों पर उल्लेखनीय बन जाता है, और तो और भारत व अमरीकी हिंदी रचनाकारों के बीच एक सेतू बाँधने का श्रेय भी अंजना जी को जाता है.
इसी प्रयास को अँजनाजी ने एक बागबान की तरह दिन रात की मेहनत से सींचकर एक महकते हुए मधुबन का स्वरूप देकर अमरिका के नारी पक्ष को उजागर किया है. यहां पर वाली आसी साहब का शेर इस बात का सँपूर्ण गवाह हैः

हमने एक शाम चरागों से सजा रक्खी है
शर्त लोगों ने हवाओं से लगा रक्खी है
हम भी अंजाम की परवाह नहीं करते यारों
जान हमने भी हथेली पे उठा रक्खी है.

उसी साहस और शालीनता का उदाहरण एक परिपूर्ण ग्रंथ (An anthology connecting the East & the West) के रूप में “प्रवासिनी के बोल” कुल मिलाकर ६२२ पन्नों के रूप में मनोभावों से भरपूर आपके सामने आया है, जिसमें यू़.एस.ए में रहने वाली ८१ अमरीकी भारतीय हिंदी कवयित्रियों की ३२४ कविताएं पहले भाग में दी गई हैं, हिंदी से जुड़ी ३३ प्रतिभाशाली महिलाओं का सचित्र परिचय दूसरे भाग में दर्शाया गया है, तथा तीसरे भाग में अमरीका में अब तक प्रकाशित महिला साहित्यकारों की प्रकाशित पुस्तकों की यादि भी शामिल है. विदेश में रचा जा रहा साहित्य ही इस बात का प्रमाण है कि हम अपने देश से दूर जरूर है, पर देश हमसे दूर नहीं. दिल्ली से राजी सेठ का कथन है ” भाषा के घेरे से परे रहकर अपनी भाषा की, देश से परे रहकर देश की, परिवेश से परे रहकर देश के रँग- रूप, तीज-त्यौहार, मिथिक -इतिहास को रचने की प्रेरणा इन्हें कौन देता होगा?” उनके उत्तर में मेरी ये दो पँक्तियाँ हर नारी के ह्रदय की पुकार है, ललकार है.

दिल में देश बसाकर रक्खा हमनें
धड़कन बनकर खुद हम बसते उसमें. देवी

हमारा घर, उसका वातावरण, दिन चर्या में हमारा चलन, आपसी व्यहवार, हमारी भाषा और संस्कृति को बरक़रार रखने के लिये हिंदी भाषा का अनुकूल उपयोग एक योगदान है. साहित्य के वरदान को अलग – अलग अनुभूतियों को भिन्न-भिन्न स्वरूप में से सजाकर इस सँकलन में पिरोया गया है, जिनमें नारी हृदय के वात्सल्य के साथ करुणा, दया, प्रेम, सेवा के भाव लिये हुए अनेक मधुर ग़ज़ल, गीत, लोक गीत, कवितायें, तीज त्यौहार पर अपनी भावनाएं, अपने कोमल ह्रदय के ताने -बाने बुनते-बुनते कभी इन्हीं अहसासों को शब्दों का जामा पहना कर बड़ी सुंदरता से प्रस्तुत किया है नारी के तस्वुर को “वसुधा” के प्रकाशक व सम्पादक श्रीमती स्नेह ठाकुर ने बड़ी खूबी के साथ प्रस्तुत किया है, पः ६७
अशक हूं
वक्त की पलकों पर टिकी हूं
लहर हूं
सागर की बाहों में थमी हूं
शबनम हूं
ज़मीं के आगोश में बसी हूं
चिंगारी हूं
शोला बन कर भड़की हूं
किरण हूं
सूरज में समाई हूं
लता हूं
तन के सहारे बढ़ी हूं
नदी हूं
कगार के बँधन में बँधी हूं
फूल हूं
काँटों से उलझी हूं
कोमल हूं
रुई के फाहों से सहेजी जाती हूं
धरती हूं
अंबर के चँदोबे तले फली फूली हूं
अबला हूं
पुरुष की संरक्षता में रहती हूं
नारी हूं
पुरुष व पुरुषार्थ की जन्मदात्री हूं.

नारी मन आकाश से ऊँच्चा व पाताल से गहरा होता है यही सत्य है, क्योंकि नारी जन्मदात्री है, हर हाल में अपना आपा बनाये रखती है कारण कुछ भी हो. मेरी एक कविता “प्रदर्शन” का एक चित्र कुछ इसी तरह का है. पः २०३

दरिद्रता को ढाँपे
अपने तन के हर पोर में
वह नारी फिर भी,
कर रही है
प्रदर्शन अपना,
उन भूखी आँखों के सामने
जो आर पार होकर
छेद जाती है निरंतर
पर देख नहीं पाती
उस नारी का स्वरूप
जो एक जन्मदाता है
जीवन को बनाये रखती है
उसको सजाने के लिये
बलि तो दे सकती है
पर, ले नहीं सकती.

और सच तो यही है, एक कण कविता का एक युग को ज़ायकेदार बना सकता है, और भाव प्रकट करने का एक निर्मल माध्यम बन जाता. आनेवाली कई पीढियों तक औरत जाति के नाम के साथ अंजना जी का नाम भी जुड़ा रहेगा. इल्म का दान उत्तम दान है, इसके द्वारा विकास व प्रगति के कई नये रास्ते खुल जाते हैं, इस युग में वतन की मिट्टी से दूर निवास करने वाली भारत के हर कोने में बसने वाली नारी, जो विदेश में आ बसी है, इस “प्रवासिनी के बोल” में अपनी कलम की जुबानी अपने मन के भावों को, अपने अँदर पनपते अहसासों को जुबाँ दे पाई है. पर अंजना जी ने इन्हें एक सूत्र में बाँध कर एक महिला संगठन को एक नई रौशनी की नींव पर खड़ा किया है. इस आशावादी सँकल्प के बल पर प्रवासी कवयित्रियों की रचनाओं में, उनकी देश से दूर रहने की वेदना, कुछ अमरीका की खट्टी -मीठी अनुभूतियाँ, मन में उठती हर भावपूर्ण लहर को खुले मन से कविता द्वारा प्रकट करने के लिये यह क्रियाशील प्रयास किया है.
फिलास्फर इलेन लाइनर का कहना हैः ” अगर लेखक ये न लिखते कि उन्हें क्या महसूस हुआ तो बहुत सारे कागज़ ख़ाली होते”. इसी सच को यदि सामने रखा जाय तो देखने को मिलेगा, उन कवित्रियों के मन का मँथन, उनके अंदर की कोमलता, द्रढ़ता, वेदना, सँघर्ष, दुख, सुख, यादों की परछाइयां, मजबूरियाँ, तन्हाइयों के साथ बातें करने का अनुभव, देश के प्रति उमड़ते उनके ज़ज़बे जिनको इसी किताब से चुनकर मैंने यहां प्रस्तुत किया हैं. अँतरमन की वेदना कुसुम टँडन ने “बनवास” नामक कविता से छलकती हुई, पः १६५

रच गया एक इतिहास नया
फिर से इस नये ज़माने में
दे दिया है बनवास राम ने
माता पिता को अनजाने में.
मेरी एक कविता “यादों का आकाश” यादों की दीवारों को खरोंच रहा है

मेरी यादों के आकाश के नीचे
दबी हुई है
मेरे ज़मीर की धरती,
थक चुकी है जो
बोझ उठाकर
अपने जे़हन के आँचल पर
झीनी चुनरिया जिसकी
तार तार हुई है
उन दरिंदों के शिकँजों से
उन खूँखार नुकीली नजरों से, जो
शराफत का दावा तो करते हैं
दुशवारियों को खरीदने का
सामान भी रखते हैं
बिक रहा है ज़मीर यहां
रिश्तों के बाजार में
बस बची है अंगारों के नीचे
दबी हुई कुछ राख
मेरे जिँदा जज्बों की
जो धाँय धाँय उड़कर
काला स्याह करती जा रही है
मेरे यादों के आकाश को.
डॉ. प्रियदर्शिनी का अनुभव जिंदगी के बारे में उनकी ज़ुबानी, पः ३५
नदी पर बना हुआ
लकड़ी का वह अस्थाई पुल है,
जिस पर हम
डगमगाते – डोलते
हिलोरें खाते
नीचे खाई में न झाँकने का प्रयास करते,
उस पार पहुँचने की ललक किये
चलते जाते हैं.
बीना टोडी “मेरा अस्तित्व” में मन को टटोल रही है, पः३१२
करता है प्रशन अचानक मेरा मन
साये से क्या वजूद है मेरा
या है अस्तित्व साये का मुझसे?
अँजना सँधीर के अपने अहसास कुछ यादों की परछाई बने हैं, पः ८४
एक बार फिर लिखें
खुशबू से भरे भीगे खत
जिन्हें पढ़ते पढ़ते भीग जाते हैं हम
इन्तज़ार करते थे डाकिये का हम
बँद करके दरवाज़ा
पढ़ते थे चुपके चुपके
वे भीगे ख़त तकिये पर सर रखकर.
“फिर गा उठी प्रवासी” की रचनाकार लावन्य शाह, का कोमल मन झूमता हुआ. पः ४१५
पल पल जीवन बीता जाए
निर्मित मन के रे उपवन में
कोई कोयल गाये रे!
सुख के दुख के, पंख लगाये
कोई कोयल गाये रे!
सारिका सक्सेना की कल्पना इँद्रधनुषी रूप धारण करती हुई उड़ रही है, पः४६०
तितली बन मन पँख पसारे
बिखरे रँग घनक के सारे.
शोख हवा से लेकर खुशबू
लिख दी पाती नाम तुम्हारे.
मेरी अपनी एक आजाद कविता “सियासत” का अँग देश के जवानों को ललकार कर खून की लाली को चुनौती
दे रहा है कुछ इस तरहः
ऐ जवानो ! तुम बचालो
बरबादी के इस अणू से
आबादियों को आतिशों से
उठ के आगे तुम बढो, करलो
सामना तूफान का
करो कुछ काम ऐसा
अमन और शोहरत से मिलो…
रजनी भार्गव के कोमल मन के अछूते अहसास “अभिमान” से , पः ३७०
आँगन में किलकती वीरानियां
जब तुलसी के आगे लौ में सुलगती है
कार्तिक की खुनक और लौ की गरमाहट- सा है
ये अभिमान मेरा.
इला प्रसाद की जुबानी “यह अमेरिका है” पः १२१
रात भर चमकता रहा जुगनू
रह रह कर
किताबों की अलमारी पर,
हरी रौशनी, जलती रही, बुझती रही
मैं देखती रही, जब भी नींद टूटी
सोचती रही
“कल सुबह पकड़ूंगी
रख लूंगी शीशे के ज़ार में,
जैसे बचपन में रख लेती थी!”

इतने अनोखे अहसास, माध्यम कविता. इस नए सँचार की श्रृंखला शुरू करके अंजना जी ने बहुत ही गौरवपूर्ण उदाहरण कायम किया है. विश्व कवि रवींद्रनाथ का कथन, बरसों बाद भी उसी सच्च को ऐलान कर रहा है. वे कहा करते थे कि शांतिकेतन का रचनाशील विद्यार्थी जहां कहीं भी जायेगा वहां एक छोटा भारत निर्मित करेगा. याद आ रहा है कालिदास का “मेघदूत” जो सालों पहले पढ़ा था, मेघ अर्थात बादल जो दूत बनकर सँदेशा ले कर आते है. अँजनाजी का सफलपूर्ण प्रयास कविता की जुबानी पूरब और पश्चिम के बीच का सेतू बनकर यही सरमाया देगा, और इसी नज़रिये से यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि उन्होंने अमेरिका में एक छोटा भारत निर्मित करने का सफल प्रयास किया है.
कहा जाता है, हासिल की हुई कामयाबी अगर जग को अच्छी लगती है पर अपने मन को नहीं भाती, तो वह अधूरी कामयाबी होती है. पर इस रचना को रचयित करने में योगदान देने वाली हर नारी इस कामयाबी का हिस्सा है, जैसे एक परिपूर्ण परिवार का मिला जुला एक सफल यग्य है ” प्रवासिनि के बोल”. नई दिल्ली से डॉ॰ कमल किशोर गोयनका का कहना है ” इस संकलन का सब से बड़ा कार्य यह है कि इतनी प्रवासी हिंदी कवयित्रियाँ पहली बार हिँदी संसार के सम्मुख आ रही हैं और इतनी प्रकार की अनुभूतियाँ हमें मिल रही हैं. मेरे विचार में यह प्रयास स्तुत्य है, स्वागत के योग्य है.” इसी बात का समर्थन करते हुए मुझे भी ऐसे लगता है, इस किताब पर हर नारी के हर्दय से निकले बोल “प्रवासिनी के बोल” के रूप में जी उठे हैं. इसी संदर्भ में, मैं सारी नारी जाति की तरफ़ से अँजना जी को हार्दिक धन्यवाद देती हूं, और शुक्रगुजार हूँ जो मुझे भी अपने इस क्रियाशील अनुभव में अपने स्नेह के धागे में पिरोकर सन्मानित किया है.
मैं अपनी यह गज़ल जिसमें अँजना जी के इस किताब ने अहसास भरे है उन्हीं को अर्पित करती हूं. वतन की याद दिल में बसी रहे, याद के दिये झिलमिलाते रहें, चाहे हम देश में हों या देश से दूर पर जब तक साँस है आस यही रहेगी और यही रहेगी.

मेरे वतन की खुशबू

बादे-सहर वतन की चँदन सी आ रही है
यादों के पालने में मुझको झुला रही है.

ये जान कर भी अरमां होते नहीं हैं पूरे
पलकों पे ख़्वाब ‘देवी’ फिर भी सजा रही है.

कोई कमी नहीं है हमको मिला है सब कुछ
दूरी मगर वतन से मुझको रुला रही है.

पत्थर का शहर है ये, पत्थर के आदमी भी
बस ख़ामशी ये रिश्ते, सब से निभा रही है.

शादाब मेरे दिल में इक याद है वतन की
तेरी भी याद उसमें, घुलमिल के आ रही है.

‘देवी’ महक है इसमें, मिट्टी की सौंधी सौंधी
मेरे वतन की खुशबू, केसर लुटा रही है.

देवी नागरानी

शुभकामनाओं के साथ

देवी नागरानी

न्यू जर्सी, यू.एस.ए
नवँबर ५, २००६
Email: dnangrani@gmail.com
URL: <http://charagedil.wordpress.com&gt;
अँजना सँधीरः anjana_ sandhir@yahoo.com

WordPress.com पर ब्लॉग.