दिल से दिल तक

अप्रैल 14, 2011

कर गई लौ दर्दे-दिल की इस तरह रौशन जहाँ

Filed under: ग़ज़ल‍-लौ दर्दे-दिल की — Devi Nangrani @ 4:37 अपराह्न

ग़ज़लः

कर गई लौ दर्दे-दिल की इस तरह रौशन जहाँ

कौंधती है बादलों में जिस तरह बर्क़े-तपाँ

साँस का ईंधन जलाया तब कहीं वो लौ जली

देखकर जिसको तड़पती रात की बेचैनियाँ

वो जली जलकर बुझी, फिर ख़ुद-ब-ख़ुद ही जल उठीं

बुझ न पाई शम्अ दिल की, आईं कितनी आंधिया

उतनी ही गहराई में वो गिरता है ख़ुद ही एक दिन

खोदता जितना जो औरों के लिए गहरा कुआँ

खो गया था कल जो बचपन, आज फिर लौट आया है

गूंज उठी आंगन में मेरे फिर वही किलकारियाँ

बेज़ुबां क्या कह रहा हैकुछ सुनो, समझो ज़रा

अनसुना करके न लादो उनपे ज़िम्मेदारियाँ

मेंने मौसम की पढ़ी अख,बार में ‘ देवी’  ख़बर

थी ख़बर ये, बाढ़ में ,हफूज़ था मेरा मकाँ

देवी नागरानी

अक्टूबर 26, 2010

महर्षि की ग़ज़लें

Filed under: ग़ज़ल-महर्षि जी की — Devi Nangrani @ 2:07 पूर्वाह्न

ग़ज़ल-5 

लाया था जो हमारे लिये जाम, पी गया

क़ासिद हमारे नाम का पैग़ाम पी गया

 

कुछ इस तरह सुनाई हमें उसने दास्तां

आया जो इख़्तिताम, तो अंजाम पी गया

 

पलकों पे कोई दीप जलाये तो किस तरह

आंसू बचे थे जो दिले-नाकाम पी गया

 

लेले के नाम सबको पुकारा किया, मगर

साकी को देखिये कि मेरा नाम पी गया

 

‘महरिष’, ये दर्द, रिदे-बलानोश है कोई

सब दिन का चैन, रात का आराम पी गया

 

—–

 ग़ज़ल-6

 नाकर्दा गुनाहों की जिली यूं भी सज़ा है

साकी नज़र-अंदाज़ हमें करके चला है

क्या होती है ये आग भी, क्या जाने समंदर

कब तिश्नालबी का उसे एहसास हुआ है

 

उस शख्स के बदले हुए अंदाज़ तो देखो

जो टूटके मिलता था, तकल्लुफ से मिला है

 

पूछा जो मिज़ाज उसने कभी राह में रस्मन

रस्मन ही कहा मैंने कि सब उसकी दुआ है

 

महफ़िल में कभी जो मिरी शिरकत से ख़फ़ा था

महफ़िल में वो अब मेरे न आने से ख़फा है

 

क्यों उसपे जफाएं भी न तूफान उठाएं

जिस राह पे निकला हूं मैं, वो राहे-वफ़ा है

 

पीते थे न ’महरिष, तो सभी कहते थे ज़ाहिद

अब जाम उठाया है तो हंगामा बपा है।

 

ग़ज़ल-7

 

इरादा वही जो अटल बन गया है

जहां ईंट रक्खी, महल बन गया है

 

ख़्याल एक शाइर का आधा-अधूरा

मुकम्मल हुआ तो ग़ज़ल बन गया है

 

कहा दिलने जो शेर भी चोट खाकर

मिसाल इक बना, इक मसल बन गया है

 

पुकारा है हमने जिसे‘आज’कह कर

वही‘वक्त’कम्बखत‘कल’बन गया है

 

ये दिल ही तो है, भरके ज़ख्मों से‘महरिष’

खिला, और खिल कर कमल बन गया है

 

—–

 

ग़ज़ल-8

 

मस्त सब को कर गई मेरी ग़ज़ल

इक नये अंदाज़ की मेरी ग़ज़ल

 

एक तन्हाई का आलम, और मैं

पेड़-पौधों ने सुनी मेरी ग़ज़ल

 

खाद-पानी लफ्ज़ो-मानी का जिला

ख़ूब ही फूली-फली मेरी ग़ज़ल

 

जब कभी जज़्बात की बारिश हुई

भीगी-भीगी-सी हुई मेरी ग़ज़ल

 

फूंकती है जान इक-इक लफ्ज़ में

शोख़, चंचल, चुलबुली, मेरी ग़ज़ल

 

ये भी है मेरे जिये राहत की बात

जांच में उतरी खरी मेरी ग़ज़ल

 

आया ‘महरिष’, शेर कहने का शऊर

मेहरबां मुझ पर हुई मेरी ग़ज़ल

महर्षि की ग़ज़लें

Filed under: ग़ज़ल-महर्षि जी की — Devi Nangrani @ 12:25 पूर्वाह्न

आर.पी. शर्मा ( उपनाम ‘महरिष’)

प्रकाशित पुस्तकें

1.    हिंदी ग़ज़ल संरचना – एक परिचय

      (सन् 1984 में मेरे द्वारा इल्मे – अरूज़ (उर्दू छंद-शास्त्र)

      का सर्वप्रथम हिंदी में मौलिक रूपांतरण)

2.    ग़ज़ल-निर्देशिका

3.    ग़ज़ल-विधा

4.    ग़ज़ल-लेखन कला

5.    व्यावहारिक छंद-शास्त्र (पिंगल और इल्मे-अरूज़ के तुलनात्मक विश्लेषण       सहित)

6.    नागफ़नियों ने सजाईं महफ़िलें (ग़ज़ल-संग्रह)

ग़ज़ल-3

बहारें हैं फीकी, फुहारें हैं नीरस

न मधुमास ही वो, न पहली-सी पावस

हवाएं भी मैली, तो झीलें भी मैली

कहां जाएं पंछी, कहां जायें सारस

उन्हें चाहिये एक सोने की लंका,

न तन जिनके पारस, न मन जिनके पारस

वो सम्पूर्ण अमृत-कलश चाहते हैं

कि है तामसी जिन का सम्पूर्ण मानस

जो व्रत तोड़ते हैं फ़कत सोमरस से

बड़े गर्व से ख़ुद को कहते हैं तापस

हुआ ईद का चांद जब दोस्त अपना

तो पूनम भी वैसी कि जैसी अमावस

अखिल विश्व में ज़ेहर फैला है‘महरिष’

बने नीलकंठी, है किसमें ये साहस

—–

ग़ज़ल-4

उनका तो ये मज़ाक रहा हर किसी के साथ

खेले नहीं वो सिर्फ़ मिरी ज़िंदगी के साथ

आज़ाद हो गये हैं वो इतने, कि बज़्म में

आए किसी के साथ, गए हैं किसी के साथ

अपनों की क्या कमी थी कोई अपने देश में

परदेश जा बसे जो किसी अजनबी के साथ

फिरते रहे वो दिल में ग़लतफहमियां लिये

ये भी सितम हुआ है मिरी दोस्ती के साथ

‘महरिष’वो हमसे राह में अक्सर मिले तो हैं,

ये और बात है कि मिले बेरूख़ी के साथ

अप्रैल 14, 2011

आर.पी. शर्मा ‘महरिष’

Filed under: ग़ज़ल-महर्षि जी की — Devi Nangrani @ 5:16 अपराह्न

 गज़ल-10 

यूं पबन, रुत को रंगीं बनाये

ऊदी-ऊदी घटा लेके आये

भीगा-भीगा-सा ये आज मौसम

गीत-ग़ज़लों की बरसात लाये

 ख़ूब से क्यों न फिर ख़ूबतर हो

जब ग़ज़ल चांदनी में नहाये

दिल में मिलने की बेताबियां हों

फ़ासला ये करिश्मा दिखाये

साज़े-दिल बजके कहता है‘महरिष’

ज़िंदगी रक़्स में डूब जाये

—–

ग़ज़ल-11

नाम दुनिया में कमाना चाहिये

कारनामा कर दिखाना चाहिये

 

चुटकियों में कोई फ़न आता नहीं

सीखने को इक ज़माना चाहिये

 

जोड़कर तिनके परिदों की तरह

आशियां अपना बनाना चाहिये

 

तालियां भी बज उठेंगी ख़ुद-ब-ख़ुद

शेर कहना भी तो आना चाहिये

 

लफ्ज़‘महरिष’, हो पुराना, तो भी क्या?

इक नये मानी में लाना चाहिये

—–

ग़ज़ल-12

क्यों न हम दो शब्द तरुवर पर कहें

उसको दानी कर्ण से बढ़कर कहें

 

विश्व के उपकार को जो विष पिये

क्यों न उस पुरुषार्थ को शंकर कहें

 

हम लगन को अपनी, मीरा की लगन

और अपने लक्ष्य को गिरधर कहें

 

है ‘सदाक़त’ सत्य का पर्याय तो

“ख़ैर” शिव को‘हुस्न’को सुंदर कहें

 

तान अनहद की सुनाये जो मधुर

उस महामानव को मुरलीधर कहें

 

जो रिसालत के लिए नाजिल हुए

बा-अदब, हम उनको पैगंबर कहें

 

बंदगी को चाहिये‘महरिष’मक़ाम

हम उसे मस्जिद कि पूजाघर कहें

—–

ग़ज़ल-13  हिचकियाँ

जैसी तुम से बिछुड़ कर मिलीं हिचकियाँ

ऐसी मीठी तो पहले न थीं हिचकियाँ

 

याद शायद हमें कोई करता रहा

दस्तकें दरपे देती रहीं हिचकियाँ

 

मैंने जब-जब भी भेजा है उनके लिए

मेरा पैग़ाम लेकर गईं हिचकियाँ

 

फासला दो दिलों का भी जाता रहा

याद के तार से जब जुड़ीं हिचकियाँ

 

जब से दिल उनके ग़म में शराबी हुआ

तब से हमको सताने लगीं हिचकियाँ

 

उनके ग़म में लगी आंसुओं की झड़ी

रोते-रोते हमारी बंधीं हिचकियाँ

 

उनको ‘महरिष’, जिरा नाम लेना पड़ा

तब कहीं जाके उनकी रुकीं हिचकियाँ

—–

ग़ज़ल-14

जाम हम बढ़के उठा लेते, उठाने की तरह

क्यों न पीते जो पिलाते वो पिलाने की तरह

 

तुम ठहरने को जो कहते, तो ठहर जाते हम

हम तो जाने को उठे ही थे, न जाने की तरह

 

कोई आंचल भी तो हो उनको सुखाने के लिए

अश्क तब कोई बहाए भी, बहाने की तरह

 

टीस कहती है वहीं उठके तड़पती-सी ग़ज़ल

दिल को जब कोई दुखाता है, दुखाने की तरह

 

गर्मजोशी की  तपिश भी तो कुछ उसमें होती

हाथ ‘महरिष’, जो मिलाते वो मिलाने की तरह

—–

ग़ज़ल-15

गीत ऐसा कि जैसे कमल चाहिये

उसपे भंवरों का मंडराता दल चाहिये

 

एक दरिया है नग़्मों का बहता हुआ

उसके साहिल पे शामे-ग़ज़ल चाहिये

 

जिसको जीभर के हम जी सकें, वो हमें

शोख़, चंचल, मचलता-सा पल चाहिये

 

और किस रोग की है दवा शाइरी

कुछ तो मेरी उदासी का हल चाहिये

 

ख़ैर, दो-चार ही की न ‘महरिष’ हमें

हम को सारे जहां की कुशल चाहिये

 

वतन की याद आती है

Filed under: ग़ज़ल‍-देवांगन — Devi Nangrani @ 4:52 अपराह्न

ग़ज़लः 1

जुदाई से नयन है नम, वतन की याद आती है

बहे काजल न क्यों हरदम, वतन की याद आती है

समय बीता बहुत लंबा हमें परदेस में रहते

न उसको भूल पाए हम, वतन की याद आती है

तड़पते हैं, सिसकते हैं, जिगर के ज़ख़्म सीते हैं

ज़ियादा तो कभी कुछ कम, वतन की याद आती है

चढ़ा है इतना गहरा रंग कुछ उसकी मुहब्बत का

हुए गुलज़ार जैसे हम, वतन की याद आती है

यहाँ परदेस में भी फ़िक्र रहती है हमें उसकी

हुए हैं ग़म से हम बेदम, वतन की याद आती है

हमारा दिल तो होता है बहुत मिलने मिलाने का

रुलाते फ़ासले हमदम,  वतन की याद आती है

वही है देश इक ‘देवी’ अहिंसा धर्म है जिसका

लुटाता प्यार की शबनम, वतन की याद आती है.

देवी नागरानी

मार्च 21, 2011

मेरा वजूद

Filed under: आज़ाद-कविता — Devi Nangrani @ 4:22 अपराह्न

सोच की हदों के बाँध तोड़कर

सरहदों के उस पार

मेरा वजूद

फिर नए सिरे से खड़ा है

सोच की तरह खामोश

खोया खोया सा

तलाशता है वो जुबां

जो कह सके

बेमतलब के हैं वो शब्द सारे

जो परिचय के लिए बांधे हैं

देवी नागरानी

यह पल

Filed under: आज़ाद-कविता — Devi Nangrani @ 4:18 अपराह्न

कल

 और आज के बीच का

यह पल मेरा है 

और यही वह समय है

 

जिसमें

 मैं उस  सचाई से परिचित हुई हूँ

कि मैं वो नहीं  

जो कुछ करती हूँ

 

करता कोई और है 

मैं वो नहीं जो सुनती हूँ

सुनता कोई और है 

मैं वो नहीं जो जीती हूँ

जीता कोई और है 

मैं तो खुद को जीवित रखने के लिए

 

रोज़ मरती हूँ 

देवी नागरानी

 

मैं कौन हूँ?

Filed under: आज़ाद-कविता — Devi Nangrani @ 4:10 अपराह्न

मैं वो कविता हूँ

जो कोई कलम न लिख पाई

रात के सन्नाटों में

तन्हाइयों का शोर

ज्वालामुखी बन कर उबल पड़ा

इक दर्द जो सदियों से

चट्टान बनकर मेरे भीतर जम गया था

वही पिघलकर

एक पारदर्शी लावा बनकर बह गया

जब मैं खाली हुई

तब जाकर जाना कि मैं कौन हूँ

देवी नागरानी

 

नवम्बर 6, 2010

महर्षि की ग़ज़लें

Filed under: ग़ज़ल-महर्षि जी की — Devi Nangrani @ 7:17 अपराह्न

ग़ज़ल-9 

है भंवरे को जितना कमल का नशा

किसी को है उतना ग़ज़ल का नशा

 

पियें देवता शौक से सोमरस

महादेव को है गरल का नशा

 

हैं ख़ुश अपने कच्चे घरौंदों में हम

उन्हें होगा अपने महल का नशा

 

पिलाकर गया है कुछ ऐसी अतीत

उतरता नहीं बीते कल का नशा

 

कोई ‘गीतिका’ छंद में है मगन

किसी को है‘बहरे-रमल’का नशा

 

बड़ी शान से अब तो पीते हैं सब

कि फ़ैशन हुआ आजकल का नशा

 

पियो तुम तो‘महरिष’सुधा शांति की

बुरा युद्ध का एक पल का नशा

 **

 गज़ल-10

यूं पबन, रुत को रंगीं बनाये

ऊदी-ऊदी घटा लेके आये

 

भीगा-भीगा-सा ये आज मौसम

गीत-ग़ज़लों की बरसात लाये

 

ख़ूब से क्यों न फिर ख़ूबतर हो

जब ग़ज़ल चांदनी में नहाये

 

दिल में मिलने की बेताबियां हों

फ़ासला ये करिश्मा दिखाये

 

साज़े-दिल बजके कहता है‘महरिष’

ज़िंदगी रक़्स में डूब जाये

**

ग़ज़ल-11

 

नाम दुनिया में कमाना चाहिये

कारनामा कर दिखाना चाहिये

 

चुटकियों में कोई फ़न आता नहीं

सीखने को इक ज़माना चाहिये

 

जोड़कर तिनके परिदों की तरह

आशियां अपना बनाना चाहिये

 

तालियां भी बज उठेंगी ख़ुद-ब-ख़ुद

शेर कहना भी तो आना चाहिये

 

लफ्ज़‘महरिष’, हो पुराना, तो भी क्या?

इक नये मानी में लाना चाहिये

 **

 ग़ज़ल-12

 क्यों न हम दो शब्द तरुवर पर कहें

उसको दानी कर्ण से बढ़कर कहें

 

विश्व के उपकार को जो विष पिये

क्यों न उस पुरुषार्थ को शंकर कहें

 

हम लगन को अपनी, मीरा की लगन

और अपने लक्ष्य को गिरधर कहें

 

है ‘सदाक़त’ सत्य का पर्याय तो

“ख़ैर” शिव को‘हुस्न’को सुंदर कहें

 

तान अनहद की सुनाये जो मधुर

उस महामानव को मुरलीधर कहें

 

जो रिसालत के लिए नाजिल हुए

बा-अदब, हम उनको पैगंबर कहें

 

बंदगी को चाहिये‘महरिष’मक़ाम

हम उसे मस्जिद कि पूजाघर कहें

**

ग़ज़ल-13  हिचकियाँ

जैसी तुम से बिछुड़ कर मिलीं हिचकियाँ

ऐसी मीठी तो पहले न थीं हिचकियाँ

 

याद शायद हमें कोई करता रहा

दस्तकें दरपे देती रहीं हिचकियाँ

 

मैंने जब-जब भी भेजा है उनके लिए

मेरा पैग़ाम लेकर गईं हिचकियाँ

 

फासला दो दिलों का भी जाता रहा

याद के तार से जब जुड़ीं हिचकियाँ

 

जब से दिल उनके ग़म में शराबी हुआ

तब से हमको सताने लगीं हिचकियाँ

 

उनके ग़म में लगी आंसुओं की झड़ी

रोते-रोते हमारी बंधीं हिचकियाँ

 

उनको ‘महरिष’, जिरा नाम लेना पड़ा

तब कहीं जाके उनकी रुकीं हिचकियाँ

**

ग़ज़ल-14

जाम हम बढ़के उठा लेते, उठाने की तरह

क्यों न पीते जो पिलाते वो पिलाने की तरह

 

तुम ठहरने को जो कहते, तो ठहर जाते हम

हम तो जाने को उठे ही थे, न जाने की तरह

 

कोई आंचल भी तो हो उनको सुखाने के लिए

अश्क तब कोई बहाए भी, बहाने की तरह

 

टीस कहती है वहीं उठके तड़पती-सी ग़ज़ल

दिल को जब कोई दुखाता है, दुखाने की तरह

 

गर्मजोशी की  तपिश भी तो कुछ उसमें होती

हाथ ‘महरिष’, जो मिलाते वो मिलाने की तरह

 

 

 

ग़ज़ल-15

 

गीत ऐसा कि जैसे कमल चाहिये

उसपे भंवरों का मंडराता दल चाहिये

 

एक दरिया है नग़्मों का बहता हुआ

उसके साहिल पे शामे-ग़ज़ल चाहिये

 

जिसको जीभर के हम जी सकें, वो हमें

शोख़, चंचल, मचलता-सा पल चाहिये

 

और किस रोग की है दवा शाइरी

कुछ तो मेरी उदासी का हल चाहिये

 

ख़ैर, दो-चार ही की न ‘महरिष’ हमें

हम को सारे जहां की कुशल चाहिये

फ़रवरी 19, 2010

Glimpses of memory lane

Filed under: Articles-English — Devi Nangrani @ 1:47 अपराह्न

 Vijay  Bhatnagar  — The Eminent Writer.

No gift is greater than the gift of knowledge and at times knowledge is in fact a reflection of the mind. The thoughts woven around the situations and circumferences create a reflective impact on the mind, and at times the transparency of the thoughts is redirected in words. A writer is always very close to his writing and a living replica at times of his conscious and subconscious acts that displays his personality.

            The best sources of knowledge are always nature and also one’s own mistakes. These two factors process you towards self realization. Vijay  Bhatnagar’s  introductory incident about smoking of a cigarette was a happening that helps him explore the depths of truth that links an illusion to reality of life. The solitude that wraps a person always draws one towards its own focal point of silence and in silence you seek, you attain and you cherish. As our philosopher and poet Ravindranath Tagore has truly said “Only a few blessed ones know the absolute truth, others merely live on its interpretation”.  

            Vijay Bhatnagar  has developed just and firm acceptance of reality for being what he is in reflected in his own words  “Sacrifices of parents shape the future of children”.   ‘Glimpses of memory Lane’ as the title of the book beautifully reflects with the vast expanse of known and unknown horizon is in a way an autobiography that has trodden the path of life. Going through testimonials of life one defiantly matures as one lives and overcomes  the moments of struggle, hardship, joy, sorrow, patience and all the possible facts of life  that  give a handy first hand experience to know ones self better and better. Walking through the lane of life,  one leans to be model role through experience. The only supporting source is God that exists in conscience . Truly going through pain and pleasure is a package deal. The  web of relations  is an intricate bifurcation  in various directions.

A Child in the cradle is the father of the nation is a common saying, and simultaneously a chils is also the creator of mankind.  All said and done the major lighthouse of life is marriage which is strong bond that grows, strengthens and sustains the family. As a  base of every relation marriage should  synchronise and try to sustain the multiple responsibilities related to  physical, mental, moral and  spiritual. well-being.

            The richness of life is painted in colours of love when you begin to love and begin to live as quoted by a Philanthropist stands  true to Vijay Bhatnagar – a man of sincere emotional outstanding of firmness.  The emotional balance is the outcome of the best frame work of mind that has borne the struggle, fall, rise and learnt  to sustain self, and that in  itself is a drilled culture, rather than just civilization that is  just superficially impose rather than drilled.  

            The different phases of Vijay’s  life as he has gone through and in the process of reflecting, feels that his thoughts guide him to the smoothest, melodious sanctuary where one disturbs him in that melancholy  canopy with self.  

            Shri. Yogendra says “when I came into the world, the only thing that really belonged to me was my body when I shall have to leave it is not the only thing that must give away to death. “ As man is a spiritual being has much more momentum and potentiality   to reproduce. Life reaps ts own rewards but at the right time and in right place. Man has to have understanding and patience , as for every act the time-frame is already set up.

I extend  my good wishes for giving us the best shared moments of his life and the truth “Give, give and give to have God on your side”                      Devi Nangrani

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